हल्द्वानी। दुनिया में हर दूसरा व्यक्ति किसी न किसी बीमारी से पीड़ित रहता है। रोग असाध्य हो तो दिक्कतें और ज्यादा बढ़ जाती हैं। अनुचित खानपान और अन्य वजहों से गुर्दे की बीमारी भी लोगों में आम हो रही है, जिसके उपचार के लिए मरीज को अस्पतालों के न केवल चक्कर काटने पड़ते हैं बल्कि हफ्ते में दो दिन डायलिसिस भी करानी पड़ती है। पहाड़ों में स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में मरीजों को इलाज के लिए महानगरों के अच्छे अस्पतालों की ओर दौड़ लगानी पड़ती है।
उजाला सिग्नेस सेंट्रल हॉस्पिटल, हल्द्वानी के वरिष्ठ नेफ्रोलॉजिस्ट डॉ. एचएस भंडारी का कहना है अब उत्तराखंड के कुमाऊं और गढ़वाल के पर्वतीय क्षेत्रों में मरीजों को डायलिसिस के लिए भटकना नहीं पड़ेगा। बातचीत में डॉ. भंडारी ने बताया कि फ्रेसेनियस कंपनी के सहयोग से उत्तराखंड और उत्तरप्रदेश से डायलिसिस तकनीशियनों और नर्सिंग स्टाफ को उजाला सिग्नेस में प्रशिक्षण दिया जा रहा है। यह तकनीशियन कुमाऊं, गढ़वाल में जहां डायलिसिस की सुविधा नहीं है वहां सेवा देंगे। इस कार्य में हंस फाउंडेशन सहयोग कर रहा है। उजाला सिग्नेस सेंट्रल अस्पताल भी तकनीशियनों को मदद करेगा।
उन्होंने बताया कि दो दिवसीय प्रशिक्षण में तकनीशियनों को एक सत्र में बेसिक जानकारी और दूसरे सत्र में पानी की गुणवत्ता बनाए रखने की महत्वपूर्ण जानकारी दी जा रही है। पर्वतीय जिलों में डायलिसिस की नि:शुल्क सुविधा करीब एक डेढ़ माह में शुरू हो जाएगी। इस मौके पर उजाला सिग्नेस सेंट्रल हॉस्पिटल के यूनिट हेड डॉ. रूपेश सक्सेना भी मौजूद रहे।
क्या है डायलिसिस....
हल्द्वानी। मनुष्य के शरीर में गुर्दे के काम बंद करने की स्थिति में डायलिसिस सेवा के जरिये उसके शरीर में खून की सफाई की जाती है। इस प्रक्रिया में शरीर में बनने वाले जहर को हर हफ्ते निकाला जाता है।
आमतौर पर 50-60 साल की उम्र में यह बीमारी देखने को मिलती है, जिसका कारण काफी लंबे समय तक शरीर में शुगर का कंट्रोल न होना, दर्द निवारक दवाइयों का अत्यधिक सेवन, पथरी का समुचित इलाज न होना है। इसकी वजह से गुर्दे खराब होने लगते हैं। हालांकि गुर्दे (किडनी) के दो मरीज होते हैं। पहला जिसके गुर्दे अचानक खराब होने लगें। यह इलाज के बाद ठीक हो जाता है, जबकि दूसरा क्रोनिक किडनी डिजीज है, जिसमें नया गुर्दा लगवाने तक डायलिसिस पर रहना पड़ता है।