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एमबीटी और नैनीताल लेक फाल्ट है वीरभट्टी में भूस्खलन का कारण

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नैनीताल। बलियानाला क्षेत्र से लेकर वीरभट्टी और ज्योलीकोट तक का समूचा क्षेत्र भूस्खलन के लिहाज से बेहद संवेदनशील है। ऐसा इसलिए क्योंकि नैनीताल लेक फाल्ट वीरभट्टी क्षेत्र में ही मेन बाउंड्री थ्रस्ट (एमबीटी) को काट रहा है। जिस कारण इस क्षेत्र में रुक रुक कर भूगर्भीय हलचल होते रहती है। यही नहीं यह समूचा क्षेत्र प्रति वर्ष साठ सेमी. से लेकर एक मीटर तक खिसक भी रहा है। जिस कारण इस क्षेत्र में अलग अलग स्थानों पर भूस्खलन होते रहते हैं।
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यह कहना है कि यूजीसी से सेवानिवृत्त हुए भूगर्भ वैज्ञानिक प्रो. बहादुर सिंह कोटलिया का। अमर उजाला से बातचीत में प्रो. कोटलिया ने बताया कि जीपीएस से कराए गए अध्ययन से पता चला कि कैलाखान से शुरू होकर बलियानाला, वीरभट्टी और ज्योलीकोट तक की पहाड़ी धीरे धीरे प्रति वर्ष खिसक रही है। यह वही क्षेत्र है जिसे भू-गर्भ वैज्ञानिक बलिया ओल्ड लेंड स्लाइड के नाम से जानते हैं। उन्होंने बताया कि मेन बाउंड्री थ्रस्ट बल्दियाखान से बेलुवाखान, वीरभट्टी और ज्योलीकोट से होते हुए काठगोदाम तक जाती है। वहीं दूसरी ओर वीरभट्टी क्षेत्र में नैनीताल लेक फाल्ट एमबीटी को काटता है।
प्रो. कोटलिया बताते हैं कि नैनीताल लेक फाल्ट में अभी कोई हलचल नहीं है जबकि एमबीटी में समय समय पर हलचल होते रहती है। चूंकि नैनीताल लेक फाल्ट यहां एमबीटी को काटता है तो इससे हलचल कभी कभी बढ़ जाती है और पहाड़ियां दरकने लगती हैं। उन्होंने बताया कि जहां जहां जमीन के भीतर फाल्ट होते हैं वहां छोटे बड़े सुराख भी होते हैं जिसे हम छोटी गुफाओं के रूप में जानते हैं। हलचल होने की स्थिति में यह गुफाएं पानी से भर जाती हैं। गुफाओं की दीवारों में कार्बोनेट होने के कारण पानी का रिएक्शन होता है और जमीन से पीले रंग का पानी रिसने लगता है। उन्होंने बताया कि तीन साल पहले बलियानाला में भी पीले पानी का बहाव हुआ था। यह उसी का नतीजा था। प्रो. कोटलिया कहते हैं कि भूगर्भीय हलचलों को न तो कम किया जा सकता है और न ही उन्हें रोका जा सकता है। लेकिन यदि हम इन हलचलों से जानमाल के नुकसान को कम करना चाहते हैं तो हमें ऐसे क्षेत्र में बनने वाले स्ट्रेक्चरों में टाप क्लास की इंजीनियरिंग की मदद लेनी होगी और जो कोई भी कार्य कराए जाएं वह हवा हवाई न होकर पूरी तरह से वैज्ञानिक तकनीक पर आधारित हों।
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अवैज्ञानिक तरीकों से किया गया दोहन भूस्खलन का बड़ा कारण
नैनीताल। वरिष्ठ भू वैज्ञानिक प्रो. बहादुर सिंह कोटलिया का कहना है कि पिछले कुछ दशकों में देश भर में बड़े हर क्षेत्र में बदलाव हुआ है। उत्तराखंड भी इससे अछूता नहीं रहा है। यहां के पर्वतीय क्षेत्रों में पोकलैंड और जेसीबी जैसी भारी भरकम मशीनों से पहाड़ियों को काटकर सड़कें और डैम बनाए जा रहे हैं। कई जगह पहाड़ों को तोड़ने के लिए विस्फोटकों का प्रयोग हो रहा है। पहाड़ के पहाड़ कंक्रीट के जंगल में तब्दील हो चुके हैं।
प्रो. कोटलिया का दावा है कि इसका सीधा असर हमारे आसपास के पर्यावरण और पहाड़ों की भू संरचना पर पड़ रहा है। भारी भरकम मशीनों व विस्फोटकों के प्रयोग के साथ साथ पेड़ों के कटान से पहाड़ियां भीतर ही भीतर कमजोर हो रही हैं। उनका कहना है कि यही कारण है कि बरसात शुरू होने के कुछ दिन बाद ही उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में अलग अलग स्थानों पर पहाड़ियां दरकने लगती हैं।
प्रो. कोटलिया कहते हैं कि जरूरत के अनुसार छोटे बड़े निर्माण कार्य भी जरूरी हैं और उन्हें कराया भी जाना चाहिए लेकिन ऐसे कार्यों को कराने के लिए पहाड़ियों का दोहन पूरी तरह से वैज्ञानिक तकनीक पर आधारित होना चाहिए। न की जहां मर्जी वहां जेसीबी और पोकलेंड चला दी। उन्होंने कहा कि पहाड़ियों के दरकने का एक बड़ा कारण पहाड़ियों का अवैज्ञानिक तरीके से किया जा रहा दोहन भी है।
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