वन और वन निगम की एक-दूसरे को जिम्मेदारी डालने की आदत के चलते परमिट के नाम पर एक तरह से खनिज की लूट मची है। सामान्य तौर पर गौला गेटों से डंपर से 140 क्विंटल खनिज निकालने का नियम है, लेकिन परमिट वाहनों से 300 क्विंटल तक खनिज निकाला गया है, पर दोनों महकमे आंख बंद किए केवल इस लूट को देखते रहे।
गौला में खनिज निकासी करने वाले वाहनों के लिए 140 क्विंटल खनिज ले जाने का नियम है, अगर वह इससे ज्यादा की निकासी करता है, तो अगले दिन उसकी खनिज क्षेत्र में घुसने को प्रतिबंधित कर दिया जाता है, पर हक-हकूक के परमिट से कितना खनिज निकाला जाए, इसके भार का कोई पैमाना तय नहीं हो सका। ऐसे में जब परमिट वाले वाहनों ने 300 तक क्विंटल (दो गुना खनिज) निकाला।
नियमानुसार तो करीब सवा लाख क्विंटल खनिज निकाला जाना था, लेकिन एक अनुमान के मुताबिक करीब दो से ढाई लाख क्विंटल खनिज निकाला गया है, इससे लाखों रुपए के राजस्व का नुकसान महकमे को हुआ। अब महकमे जिम्मेदारी एक-दूसरे पर डालने में लगे हैं, क्योंकि परमिट वन विभाग जारी करता है, ऐसे में वन निगम सीधे तौर पर जिम्मेदार नहीं हो सकता। वहीं, वन महकमे का तर्क है कि जब खनन शुरू हो रहा था, तब निगम के डीएलएम को सामान्य वाहनों की तरह परमिट वाहनों के लिए कंप्यूटर के साफ्टवेयर में वजन के संबंध में व्यवस्था करने को कहा गया, जिससे वह अतिरिक्त खनिज नहीं निकाल सके, पर ऐसा वन निगम ने नहीं किया।
एसडीओ एनसी पंत कहते हैं कि नियमों को ताक पर रखकर बड़ी संख्या में परमिट पर ज्यादा वजन ले जाने की शिकायत मिली। इसे रोकने के लिए वन निगम ने कोई कोशिश नहीं की। वन महकमे ने कांटे की पर्ची दिखाकर आगे के परमिट देने की व्यवस्था लागू करने का प्रयास किया, लेकिन यह भी कारगर नहीं हुआ। अगली बार तौल साफ्टवेयर में परमिट वाहनों को लेकर व्यवस्था की जाएगी। तभी खनिज निकलेगा।