जिले के प्राइमरी स्कूलों के 40 हजार से अधिक बच्चों की वार्षिक परीक्षाएं भगवान भरोसे छोड़ दी गई हैं। शिक्षा विभाग द्वारा स्कूलों को वार्षिक परीक्षाएं कराने के लिए कोई पैसा नहीं देने से किसी स्कूल में बोर्ड पर लिखकर तो किसी में फोटोस्टेट पेपर देकर बच्चों की परीक्षा हो रही है, जिसे देखने वाला कोई नहीं है।
प्राइमरी स्कूलों को प्रति बालक 30 रुपए के हिसाब से परीक्षा शुल्क दिया जाता था, लेकिन पिछले साल से शिक्षा विभाग के पास परीक्षा मद में बजट ही नहीं है। बताते हैं कि शिक्षा विभाग को सर्वशिक्षा अभियान के तहत केंद्र से जो बजट मिलता है, उसी में परीक्षा का मद भी शामिल होता था, लेकिन इसमें पिछले साल से केेंद्र ने कटौती कर दी है, जिस कारण शिक्षा विभाग ने भी हाथ खड़े कर दिए हैं।
शासन स्तर से धनराशि जुटाने के बजाय स्कूलों को ही अपने संसाधनों से परीक्षा कराने का निर्देश दिया गया। पहले स्कूल स्तर पर भी बच्चों से परीक्षा शुल्क के रूप में फीस ली जाती थी, जो कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम लागू होने के बाद से बंद हो गई है। आरटीआई के तहत कक्षा एक से लेकर आठ तक के बच्चों से किसी तरह का शुल्क नहीं लिया जा सकता।
केस - वन
प्राइमरी स्कूल फूलचौड़ में कुल 132 बच्चे पंजीकृत हैं। मंगलवार को ‘हमारे आसपास’ विषय का पेपर था। कक्षा पांच के बच्चों को प्रश्नपत्र के साथ ही उत्तर पुस्तिका भी अध्यापिकाओं ने अपने स्तर से उपलब्ध कराई थी। छोटे बच्चों को प्रश्न बोर्ड पर लिखकर दिए गए थे। प्रधानाध्यापिका रेखा खाती सीआरसी गई थीं। एक कक्षा में एक बालिका बच्चों को पढ़ा रही थी। कक्षा तीन के बच्चों से एक प्रश्न पूछा गया था - विद्यालय में क्या करने आते हो तो छात्र सोहन ने उत्तर दिया था खाना खाने तो एक छात्रा ने उत्तर दिया था पढ़ने, अच्छी बातें सीखने।
केस- दो
प्राइमरी स्कूल हल्दूपोखरा में कुल 36 बच्चे पंजीकृत थे। यहां प्रधानाध्यापिका विमला जोशी तैनात हैं। पांच कक्षाओं में वह अकेले परीक्षा ले रहीं थी। कक्षा तीन के लिए हिंदी और गणित के प्रश्नपत्र डायट से छपे हुए मिल गए थे, कक्षा चार के बच्चों को फोटोस्टेट पेपर देकर उसी पर उत्तर लिखवाया जा रहा था। केवल कक्षा पांच के बच्चों को उत्तर पुस्तिका दी गई थी। अध्यापिका का कहना था कि परीक्षा की व्यवस्था उन्होंने अपने स्तर से की है।
सर्वशिक्षा अभियान के तहत विभाग को परीक्षा मद में बजट नहीं मिला है। इसलिए प्राइमरी और जूनियर हाईस्कूलों को अपने संसाधनों से बच्चों का वार्षिक मूल्यांकन करने के निर्देश दिए गए हैं। अब परीक्षाएं नहीं बालमैत्रीपूर्ण मूल्यांकन की व्यवस्था है।
- आरसी पुरोहित, जिला शिक्षा अधिकारी (बेसिक)