धुर जनवादी, किसान, मजदूर व वंचित वर्ग के मसीहा और समाजवाद को लेकर आजीवन संघर्षरत रहे राजेश्वर ''राजा'' बहुगुणा त्याग, सेवा और समर्पण की वह मिसाल रहे जिसका दूसरा उदाहरण उत्तराखंड में शायद ही मिले। यह विधि का विधान ही है कि 1977 में राजा ने अपने जीवन के पहले बड़े आंदोलन की शुरुआत आज ही के दिन 28 नवंबर को की थी और आज की ही तिथि में वह आंदोलन करते हुए पहली बार गिरफ्तार भी हुए थे। संयोगवश इसी तिथि को उनका निधन हुआ। उनकी शुरुआती कर्मभूमि नैनीताल ही रही। इतने वर्षों में अंतर आया तो बस इतना कि तब की चिंगारी राजा बाद में एक मशाल बन गए जो उनका सबसे प्रिय प्रतीक भी था।
1977 में नैनीताल में जंगलों की नीलामी के विरोध की घटना उत्तराखंड के वन संरक्षण आंदोलन का महत्वपूर्ण अध्याय है। तब कुमाऊं, विशेषकर नैनीताल में, जंगलों की नीलामी, ठेकेदारों का वनों पर नियंत्रण और तेजी से बढ़ती वनों की कटाई के खिलाफ जनभावना उफान पर थी। 70 के दशक में कुमाऊं में चिपको आंदोलन से प्रेरित होकर स्थानीय लोगों, छात्रों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और पर्यावरण समर्थकों ने सरकार की ओर से की जाने वाली जंगलों की नीलामी का व्यापक विरोध किया। जंगलों की कटाई के लिए एक नीलामी प्रस्तावित थी। इसके विरोध में 28 नवंबर 1977 को नैनीताल में एक बड़ा प्रदर्शन हुआ। विरोध की शुरुआत करने वालों में राजा बहुगुणा, डा. शमशेर सिंह बिष्ट, पीसी तिवारी, विनोद पांडे, निर्मल जोशी आदि रहे।
प्रदर्शनकारियों की मांग थी कि जंगलों को ठेकेदारों के हाथों में न देकर ग्राम समुदायों की भागीदारी और संरक्षण की नीति अपनाई जाए। इसी विरोध के तुरंत बाद यहां के ब्रिटिशकालीन स्थापत्य कला के अनुपम उदाहरण प्रसिद्ध नैनीताल क्लब में भीषण अग्निकांड हो गया। इससे पूर्व ही गिरफ्तार होने के कारण आंदोलनकारियों का इसमें कोई हाथ नहीं था। इस वन नीलामी के विरोध आंदोलन और उसके आसपास की घटनाओं का 80 के दशक के बड़े वन आंदोलनों और बाद में राज्य निर्माण की राजनीतिक चेतना में भी योगदान रहा।
28 नवंबर से शुरू हुआ राजा बहुगुणा का संघर्ष
सरकारी नौकरी छोड़ी, घर वालों ने दिया पूरा साथ
राजा के पिता रामप्रसाद बहुगुणा नैनीताल में डाक मंडल कार्यालय में थे। राजा की उच्च शिक्षा डीएसबी परिसर में हुई। तीन बहनों दो भाइयों के परिवार में बड़ी बहन के बाद दूसरे नंबर पर थे। कॉलेज के समय से ही गरीबों के हमदर्द थे। केएमवीएन की नौकरी छोड़ने पर घर में सवाल पूछा तो बोले तुम्हारे घर में दो टाइम चूल्हा जलता है, बहुतों के घर में एक टाइम भी नहीं, मुझे उनकी लड़ाई लड़नी है। घर वालों ने राजा का हर कदम पर साथ दिया।
इन आंदोलनों में निभाई प्रमुख भूमिका
1989 में उन्होंने लोकसभा चुनाव लड़ा
2013 में केदारनाथ आपदा के बाद उनके नेतृत्व में त्रासदी पर एक विस्तृत दस्तावेज प्रकाशित हुआ था। वे पार्टी के उत्तराखंड राज्य सचिव, केंद्रीय कमेटी सदस्य, ट्रेड यूनियन एक्टू के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और एआईपीएफ की केंद्रीय कार्यकारिणी के सदस्य थे। पटना में 2023 में हुए 11वें पार्टी महाधिवेशन में वे केंद्रीय कंट्रोल कमीशन के अध्यक्ष चुने गए। वे उत्तराखंड में पार्टी के संस्थापक नेता रहे। पूर्व में इंडियन पीपल्स फ्रंट के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष भी रहे।