मोबाइल की चमक, मन के मतभेद और जिम्मेदारियों के भारीपन के बीच अब घरों की चौखट पर रिश्तों का संतुलन डगमगाने लगा है। कभी छोटी-छोटी नोकझोंक तक सीमित रहने वाले झगड़े अब मनभेद में बदलकर महिला सेल तक पहुंच रहे हैं। कहीं बच्चे संभालने पर तकरार है, कहीं खर्चे पर अविश्वास तो कहीं मोबाइल की दुनिया ने दांपत्य जीवन से दूरी बढ़ा दी है। शिकायतें भले ही अलग-अलग हैं लेकिन इनके कारण पति-पत्नी के बीच संवाद की कड़ी टूटती जा रही है। रिश्तों में खामोशी छा रही है। कोतवाली परिसर में स्थित महिला सेल में आए दिन पारिवारिक मतभेद की समस्याएं आ रही हैं।
हर माह आते हैं 60-70 केस
केस एक
बनभूलपुरा के इमरान (काल्पनिक नाम) और सायरा (काल्पनिक नाम) के निकाह को दस साल हो गए। उनके तीन बच्चे हैं। प्राइवेट नौकरी करने वाले इमरान और सायरा के बीच का मतभेद समय के साथ मनभेद बन चुका है। बंद कमरे का झगड़ा अब तलाक के दरवाजे पर दस्तक दे चुका है। दोनों एक साथ नहीं रहना चाहते। मामला महिला सेल में पहुंच गया। पति का आरोप है कि बीवी बच्चा नहीं संभाल पाती है जबकि पत्नी ने उस पर खर्च के पैसे नहीं देने का आरोप लगाया।
केस दो
केस तीन
रामनगर के दंपती के बीच मोबाइल का ज्यादा प्रयोग विवाद का कारण है। दोनों एक-दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं कि वे मोबाइल का इस्तेमाल ज्यादा करते हैं। शिकायत महिला सेल तक पहुंची। पति रमेश (काल्पनिक नाम) का कहना है कि पत्नी घर के काम नहीं करती है। मोबाइल चलाती रहती है। पत्नी दीपा (काल्पनिक नाम) ने पति पर काम-धाम न करने तथा जान-बूझकर परेशान करने का आरोप लगाया। दोनों अब साथ नहीं रहना चाहते हैं।
दो व्यक्तियों के विचार एक जैसे नहीं हो सकते हैं। पति-पत्नी के संबंध में भी यही होता है। दोनों को इसे भली-भांति समझना चाहिए। एक या दोनों को समझौतावादी बनना पड़ेगा। झगड़े रोकने का यही एकमात्र उपाय हो सकता है। ये विवाद मैरिटल डिस्कॉर्ड की श्रेणी में आता है। यदि विवाद न थमे तो मानसिक रोग विशेषज्ञ से मिलकर काउंसलिंग कराएं। परिवार तभी बचेगा जब दोनों में आपसी समझ हो। - डॉ. युवराज पंत, मनोचिकित्सक