आपदा में फसलों के पूरी तरह बर्बाद होने और उसके बाद बैंक से लिए गए कर्ज के चुकता न होने के कारण मौत को गले लगा चुके जीत सिंह बोहरा के परिजनों की एक साल चार माह बाद भी किसी ने सुध नहीं ली। ऐसे में जहां एक ओर बैंक कर्ज में साल-दर-साल ब्याज बढ़ रहा है, वहीं दिवंगत जीत सिंह के परिजन बैंक का कर्ज चुकाने के लिए ग्रामीणों से कर्ज लेने को मजबूर हैं।
ओखलकांडा ब्लाक के धरता तोक निवासी जीत सिंह बोहरा कभी ब्लाक मुख्यालय के पास ही चाय की छोटी सी दुकान चलाते थे। घर में 71 वर्षीय बूढ़ी मां आनंदी देवी, पत्नी रेवती देवी और तीन बेटे राजेंद्र सिंह, भवान सिंह, सोबन सिंह और बहुओं से भरा-पूरा परिवार खुश था। वर्ष 2011 में जीत सिंह ने बैंक से कर्ज लेकर एक ट्रक और एक मार्शल जीप खरीदी, लेकिन यह कारोबार उन्हें नहीं फला और पांच माह बाद ही उन्होंने दोनों वाहन बेच दिए।
अप्रैल 2012 में जीत सिंह ने ओखलकांडा स्थित बैंक आफ बड़ौदा की शाखा से तीन लाख रुपए का फसली कर्ज लिया था, जिसकी अदायगी अप्रैल-2013 में होनी थी, लेकिन जून-जुलाई 2012 में आई आपदा में जीत सिंह की फसलें पूरी तरह बर्बाद हो गई तो बैंक से लिया गया कर्ज जमा नहीं कर पाए। इसी दौरान एक दुर्घटना में बुरी तरह घायल होने के बाद जीत सिंह को हल्द्वानी स्थित निजी अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। पल्ले में जो राशि थी वह इलाज में खर्च हो गई। किसी तरह ठीक होकर अस्पताल से घर पहुंचे तो चौबीसों घंटे बैंक कर्ज की अदायगी को लेकर गुमसुम रहने लगे। इसी दौरान 27 दिसंबर को जीत सिंह ने घर में ही जहर खाकर जीवन लीला खत्म कर ली, लेकिन फसली ऋण के लिए बैंक से लिए गए कर्ज का बोझ अब भी बेहद मुफलिसी में जी रहे उनके परिजन ढो रहे हैं। जीत सिंह के दो बेटे बेरोजगार हैं और तीसरा दिल्ली में किसी कंपनी में नौकरी करता है। बैंक का कर्ज अदा करने में सक्षम न होने के कारण जीत सिंह के पुत्र गांव के अन्य लोगों से कर्ज लेकर बैंक कर्ज के ब्याज की अदायगी कर खुद भी कर्जदार होते जा रहे हैं।