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पिथौरागढ़ के अजय ओली को मिलेगा राष्ट्रीय युवा पुरस्कार

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पिथौरागढ़। देशभर के सात युवाओं का चयन राष्ट्रीय युवा पुरस्कार के लिए हुआ है। इनमें पिथौरागढ़ के अजय ओली भी शामिल हैं। इन युवाओं को राष्ट्रपति सम्मानित करेंगे।
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जिले के किसी युवा को 10 साल बाद ये पुरस्कार मिल रहा है। अजय बच्चों को शिक्षा से जोड़ने, उन्हें बालश्रम और बाल भिक्षा जैसे अभिशाप से मुक्त कराने की मुहिम चला रहे हैं।
मूलरूप से टाणा निवासी अजय (29) ने वर्ष 2015 में बच्चों के लिए जीवन समर्पित कर लखनऊ से नंगे पांव पैदल यात्रा शुरू कर अपने अभियान की शुरुआत की।
मानव संसाधन, होटल मैनेजमेंट और टूरिज्म में मास्टर कर चुके अजय ने प्राइवेट कंपनी की नौकरी छोड़कर निराश्रित बच्चों के लिए खुद को समर्पित किया।
उन्होंने देशभर के 110 से अधिक शहर, आठ राज्य, 1300 से अधिक संस्थानों में जाकर तीन लाख से अधिक लोगों को जागरूक किया और हजारों लोगों को अभियान से जोड़ा। वह एक लाख से अधिक किमी तक नंगे पांव यात्रा कर चुके हैं।
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अजय का सफर मुश्किल भरा रहा, लेकिन बच्चों की मुस्कान देख उन्हें अतुलनीय खुशी और सुकून मिलता है जो इस मुश्किल को आसान बना देता है। कई बच्चों को शिक्षा आदि जरूरी सुविधाएं दिला रहे अजय 17000 से अधिक बच्चों को शिक्षा से जोड़ चुके हैं।
अजय ने अपनी सफलता का श्रेय स्व. दादाजी घनश्याम ओली, माता धनेश्वरी देवी, पिता गिरीश ओली, बुआ प्रेमा सुतेड़ी, भाई अमित ओली, पूर्व डीएम सी रविशंकर, पूर्व सीओ शेखर सुयाल, युवा संयोजक ध्रुव डोगरा, नितिन मारकाना, पूजा भट्ट को दिया। पुरस्कार कब मिलेगा, फिलहाल अभी इसकी तिथि घोषित नहीं की गई है।
बुक ऑफ रिकॉर्ड में दर्ज करा चुके नाम
पिथौरागढ़। इससे पहले अजय ओली लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड और इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड में भी अपना नाम दर्ज करवा चुके हैं। उन्होंने सभी लोगों से बच्चों का भविष्य बचाने में सहयोग की अपील की है। कहा कि इसके लिए बाल भिक्षा और बाल श्रम रोकें और बच्चों को शिक्षा से जोड़ें। घनश्याम ओली चाइल्ड वेलफेयर सोसायटी इस मुहिम में हरसंभव अपना योगदान देगी।
पिथौरागढ़ को मिले हैं तीन राष्ट्रीय पुरस्कार
पिथौरागढ़। सीमांत जिले के तीन युवाओं को राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुका है। इससे पहले 1998-99 में जगदीश भट्ट और 2010-11 में प्रदीप माहरा को पुरस्कार मिल चुका है।
अजय ने बताया कि इस सफर में नेहरू युवा केंद्र का अहम योगदान रहा है और युवा संयोजक ध्रुव डोगरा को इसका बड़ा श्रेय जाता है। उन्होंने शुरुआत से ही उनका मनोबल बढ़ाकर पुरस्कार संबंधी हर पहलू में उनकी सहायता की।
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