हल्द्वानी। कुमाऊं के सबसे बड़े सुशीला तिवारी अस्पताल जुगाड़ के दम पर चल रहा है। अस्पताल की मशीनें बूढ़ी हो चुकी है। इमरजेंसी में वैकल्पिक व्यवस्था के तहत डॉक्टरों को तैनात कर रोगियों का इलाज किया जा रहा है।
सुशीला तिवारी अस्पताल में डायलीसिस, एमआरआई से लेकर सीटी स्कैन जैसी आवश्यक जांच मशीनों की खरीद उत्तराखंड फॉरेस्ट हॉस्पिटल ट्रस्ट के समय पर हुई थी। यह मशीनें करीब 10 से 12 साल पुरानी हो चुकी है, जो अक्सर खराब हो जाती है। इन मशीनों को मरम्मत कर जैसे-तैसे काम चलाया जा रहा है। मौजूदा समय में लेप्रोस्कोपी मशीन खराब पड़ी है, जिससे रोगियों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। सुशीला तिवारी अस्पताल में सबसे ज्यादा शिकायत इमरजेंसी को लेकर होती है। उत्तराखंड फॉरेस्ट हॉस्पिटल ट्रस्ट के समय कैजुअल्टी मेडिकल अफसरों (सीएमओ) के आठ पद थे। बाद में पदों को बढ़ाने की जगह घटाकर चार कर दिया गया। इमरजेंसी में तैनात तीन सीएमओे पीजी कोर्स करने के बाद अब दूसरे विभागों में सेवा देते हैं। वह एक से तीन दिन तक वैकल्पिक व्यवस्था के तहत इमरजेंसी सेवा देते हैं। अस्पताल के अन्य विभागों में भी डॉक्टरों की कमी है।
सुशीला तिवारी अस्पताल में ही रैन बसेरा
हल्द्वानी। हल्द्वानी के बेस, महिला, सुशीला तिवारी अस्पताल में पूरे कुमाऊं से लोग इलाज के लिए आते हैं। पर रोगियों के परिजनों के ठहरने की व्यवस्था (50 बेड है) केवल सुशीला तिवारी अस्पताल में है, इस रैन बसेरा की शुरुआत भी दबाव पड़ने के बाद करीब दो साल पहले की गई थी।
स्वास्थ्य विभाग के भी हाल खराब
कुमाऊं में स्वास्थ्य विभाग के अधीन अस्पतालों की हालत खराब है। स्वास्थ्य विभाग सृजित 981 पदों के सापेक्ष 714 डॉक्टर तैनात है। 267 पद खाली हैं। स्वास्थ्य विभाग के अधीन किसी भी अस्पताल में सुपर स्पेशलिस्ट चिकित्सक तैनात नहीं हैं।