पिछले तीन-चार दशकों में हल्द्वानी का तेजी से फैलाव हुआ। हल्द्वानी पर दिन ब दिन आबादी का बोझ बढ़ा। कुछ नहीं बढ़ा तो इस आबादी की प्यास बुझाने के लिए संरचनात्मक ढांचा। आज भी 60 से 70 साल पुरानी बूढ़ी और जर्जर लाइनों से पेयजल की आपूर्ति की जा रही है। यही टूटी-फूटी लाइनें बाद में जलजनित रोगों का सबब बन रही है।
जल संस्थान के आंकड़ों के मुताबिक शहर में बड़ी पेयजल लाइनों का जाल 250 किमी में फैला है। इस लाइन से गौला से फिल्टर प्लांट, ट्यूबवेल से ओवरहेड टैंकों आदि की पानी आपूर्ति की जाती हैै। इसके साथ ही 200 किमी लंबी पेयजल लाइनों से ओवरहेड टैंक व ट्यूबवेल से घरों में पानी की आपूर्ति होती है। ये लाइनें करीब 60-70 साल पुरानी है। विभाग की मानें तो 1950-60 के दशक में पेयजल लाइनें बिछाई गई थीं। तब से इन्हीं लाइनों से आपूर्ति की जा रही है। साल दर साल बीतते चले गए लेकिन इन लाइनों के उद्धार के लिए कोई पहल नहीं की गई। हर साल लाखों की आबादी को प्यास बुझाने के सरकारों के तमाम दावे होते हैं लेकिन इन लाइनों को मजबूत करने के लिए बजट नहीं दिया जाता है। शहर में तेजी से आबादी बढ़ने के बावजूद इन लाइनों को सुदृढ़ीकरण पर जोर नहीं दिया गया नतीजा यह रहा कि लाइनें क्षतिग्रस्त हो गईं। विभाग भी किसी तरह टूटी-फूटी लाइनों से पेयजल सप्लाई कर रहा है।
60 के दशक में लाइनें बिछाई गई थी इसके बाद नई लाइनोें के बिछाने का काम नहीं हुआ है। अब अमृत योजना में शहर को जोन में बांटकर नई पेयजल लाइनें बिछाई जा रही हैं।
-- संतोष उपाध्याय, ईई जल संस्थान हल्द्वानी