संत आसाराम के गुरू बाबा लाल शाह थे। दूसरे गुरू के रूप में वे हरिद्वार के प्रसिद्ध टाटवाले बाबा का जिक्र करते रहे हैं। आसाराम बापू कई बार हरिद्वार आए और टाटवाले बाबा के सानिध्य में महीनों बिताए।
यह बात और है कि टाटवाले बाबा ने कभी भी संत आसाराम को दीक्षा नहीं दी। ऐसे ही बाबा लाल शाह ने भी आसाराम को दीक्षित नहीं किया।
70 और 80 के दशक में हरिद्वार
आसाराम बापू का हरिद्वार आगमन 70 और 80 के दशकों में बार-बार होता रहा। बिरला घाट पर टाटवाले बाबा सीढ़ियों के नीचे खुले में जीवन बिताते थे और जुगल किशोर बिरला सहित देश की कई जानी-मानी हस्तियां उनसे मिलने वहीं आया करती थी।
बाबा ने न तो कभी कोई आश्रम बनाया और न कोई घर। संत आसाराम भी जब केवल आसाराम थे, तब टाटवाले बाबा से ज्ञान लेने बिरला घाट पर लंबे समय तक जीवन बिताते रहे।
घाट पर मालिश
वे हरिद्वार के श्याम लाल सिंधी, प्रसिद्ध टेलर के.राज और व्यवसायी रमेश मेछी के साथ बिरला घाट पर मालिश करने वालों से मालिश भी कराया करते थे।
श्याम लाल सिंधी बताते हैं कि संत आसाराम उस समय केवल आसाराम थे और उन्हें मालिश कराने का बहुत शौक था।
नहीं दी दीक्षा
बाद में बिरला घाट के इसी परिचय के सहारे आसाराम के संत आसाराम बन जाने के बाद श्याम लाल सिंधी उनके अहमदाबाद स्थित विशाल आश्रम में भी गए और संत आसाराम ने उन्हें गले लगा लिया।
आसाराम बापू का अब तो हरिद्वार में अपना आश्रम भी है लेकिन पहले वे केवल टाटवाले बाबा के पास ही आया करते थे। उन्होंने बाबा से कईं बार दीक्षा देने को कहा।
प्रवचन करो
टाटवाले बाबा ने यह कहकर टाल दिया कि दीक्षा न लो, केवल प्रवचन करो। वक्त आएगा तो दीक्षा मिलेगी। वह वक्त कभी नहीं आया।
बाबा धरती से चले गए। आज भी आसाराम बापू जब अपने किसी परिजन की अस्थियों के साथ अथवा मई में होने वाले वार्षिक प्रवचन के लिए हरिद्वार आते हैं, तब टाटवाले बाबा की समाधि पर जरूर जाते हैं।