यहां भूस्खलन से सड़क अवरुद्ध हुई तो देहरादून से उत्तरकाशी की ओर जा रहे वाहनों के पहिए थम गए। आम से लेकर खास सभी परेशान थे, लेकिन गाड़ी से उतरकर वहां बहते पानी से खेलते दो मासूमों के चेहरों पर शिकन भी नहीं थी।
हर खबर से बेखबर पानी की लहरों से खेलते इन बच्चों को ये भी नहीं मालूम था कि पानी ने ही उनके पिता को हमेशा के लिए उनसे छीन लिया। सात साल के अमित व उसके पांच साल के भाई ललित ही नहीं उनकी मां सुनीता को भी गांववालों ने अभी तक नहीं बताया कि केदारनाथ हादसे में उनका सब कुछ उजड़ चुका है।
उत्तराखंड आपदा की विशेष कवरेज के लिए क्लिक करें
दिल्ली में रहने वाले कामदा चिन्यालीसौड़ निवासी निहाल सिंह पुत्र नारायण सिंह, जितेंद्र व उनका एक और साथी दिल्ली से टैक्सियों में तीर्थयात्रियों को केदारनाथ की यात्रा कराने ले गए थे। यात्री केदारनाथ चले गए और ये तीनों सीतापुर में अपनी गाड़ियों में ही सो गए थे।
लाशें हरिद्वार तक पहुंच गईं
16 जून की रात आठ बजे निहाल ने आखिरी बार फोन पर गांव में बात की थी और जल्द ही बच्चों को साथ लेकर गांव आने की बात कही थी। केदारनाथ में सैलाब आया और लाशें हरिद्वार तक पहुंच गईं। गांव वाले भी निहाल की तलाश में वहां गए और लक्सर में उसके शव की शिनाख्त हो गई। वहीं उसका अंतिम संस्कार कर दिया गया।
अब गांव वाले निहाल की पत्नी व उसके दोनों बेटों को दिल्ली से छुट्टियों के बहाने गांव लिवा ले जा रहे हैं। पत्नी सुनीता को बताया गया है कि निहाल को थोड़ी चोट लगी है। बच्चे तो खैर पूरी तरह हकीकत से अनजान हैं। लेकिन निहाल की मौत का कड़वा सच केवल सफर तक ही छिपा रहेगा। शाम होते ये लोग कामदा पहुंचेंगे तब उन्हें रात का स्याह अंधेरा जीवन में भी छा जाने का पता लगेगा।
भावनाएं जुड़ती गईं
मौरियाणा टॉप पर लगे जाम में फंसे लोगों को जैसे-जैसे इन बच्चों के सिर से पिता का साया उठने की जानकारी लगती गई उनकी भावनाएं बच्चों के साथ जुड़ती गई। हर व्यक्ति इन बच्चों पर प्यार बरसाने को आतुर था, लेकिन हर कोई इसका ध्यान भी रख रहा था कि बच्चों को सच्चाई का पता न लग जाए।