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आपदा में भी खड़ी रही चावल-दाल के गारे से बनी ये इमारत

Wed, 26 Jun 2013 08:45 AM IST
संजू पंत
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उत्तराखंड में आपदा के बाद तबाही की तस्वीरें पूरे देश ने देखी। तमाम मजबूत इमारतें ताश के पत्ते की तरह भरभरा कर ढह गईं। कुमाऊं का पिथौरागढ़ भी इस तबाही से अछूता नहीं था
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लेकिन 1943 में चावल और उड़द की दाल के गारे से बना डीडीहाट का नारायण नगर इंटर कॉलेज की इमारत जस की तस खड़ी है।

बिना सीमेंट सरिये का भवन नई तकनीक और मजबूती को चुनौती दे रहा है। पिथौरागढ़ जिले ही नहीं पहाड़ के कुछ अन्य इलाकों में भी इस तरह की निर्माण सामग्री का इस्तेमाल होता था।

नारायण नगर इंटर कॉलेज के 8 कमरे और छात्रावास के 20 फीट ऊंचे 12 कक्षों के भवन का निर्माण पिसे चावल और उड़द की दाल के मिश्रण से बना हुआ है।

मजबूती देने को इसमें चूने को मिलाकर तैयार मसाले को दो पत्थरों के बीच भरा गया।

व्यापारी मोहन मर्तोलिया बताते हैं कि भवन की लागत उस समय में करीब 5.80 लाख रुपये आई थी। 1938 से शुरू हो यह भवन 1943 में पूरा हुआ। सिर्फ पत्थरों की कटिंग और चिनाई के लिए मजदूर लगे।
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आसपास के 35 गांवों के 150 लोगों ने शेष काम श्रमदान से किया। दाल और चावल पीसने का काम महिलाओं ने किया। टिन, चूना और नट-वोल्ट हल्द्वानी से लाया गया।

निर्माण में करीब 30-30 कुंतल चावल, दाल और एक कुंतल चूना लगा। इलाके के वरिष्ठ नागरिक नारायण सिंह कन्याल का कहना है कि 1935 में कैलास यात्रा को आए गुजरात के समाजसेवी नारायण स्वामी ने विद्यालय निर्माण की प्रेरणा दी।

अकेला इंटर कॉलेज अल्मोड़ा में होने से लोगों में इसके निर्माण को लेकर खासा उत्साह था। श्रमदान करने वाले 96 वर्षीय केश राम बताते हैं कि सीमेंट न तो सुलभ था नहीं इसे खरीदने के लिए पैसा था। तब निर्माण में सीमेंट के बजाय पिसे चावल और उड़द के उपयोग का विचार आया।

मजबूत होता है चावल, उड़द का जोड़
लोक निर्माण विभाग के अधिशासी अभियंता बदलू राम का कहना है कि चावल, उड़द की दाल में चूने के मिश्रण में जबरदस्त बाइंडिंग पावर है। ये सीमेंट का बेहतरीन विकल्प भी है। अब इस तरह के भवन का निर्माण नहीं होता है।

आम निर्माण से इसकी लागत करीब 35 प्रतिशत ज्यादा है। लागत में अंतर के अलावा अब सीमेंट की सुलभता और दाल के उत्पादन में कमी आना है। पहले सिमार खेत होने से तब धान और दलहन की फसल बहुतायत में होती थी।

इसी आपदा में तबाह हुए आठ स्कूल भवन
15 जून से हुई बारिश के बाद मची तबाही में ही जिले में आठ स्कूल भवन तबाह हुए हैं। इनमें से अधिकांश इमारतों को बने हुए 20 वर्ष भी नहीं हुए थे, वहीं 70 साल पुरानी इस इमारत की कभी रिपेयरिंग तक नहीं की गई है।
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