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हरीश रावत की आबकारी नीति खारिज, पुरानी नीति लागू

Tue, 19 Apr 2016 09:30 PM IST
टीम डिजिटल/ अमर उजाला, देहरादून

सार

  • एफएल- 2 समाप्त कर 2014-15 की आबकारी नीति लागू
  • कारोबार से मंडी परिषद का एकाधिकार समाप्त
  • शराब निर्माता कंपनियां स्वतंत्र तरीके से कर सकेगी कारोबार
  • बीयर कंपनियों द्वारा आउटलेट खोलने की योजना समाप्त
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हरीश रावत
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विस्तार
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उत्तराखंड में हरीश रावत सरकार द्वारा लागू आबकारी नीति को खारिज कर राज्य में पुरानी आबकारी नी‌ति लागू कर दी गई हैं।इसके बाद अब प्रदेश में हर ब्रांड की शराब बिक सकेगी।
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इस बड़े फैसले के बाद उत्तराखंड कांग्रेस को बड़ा झटका लगा है। अब राज्य में 2014-15 में लागू आबकारी नीति लागू की गई है। अब पुरानी नीति के आधार पर ही उत्तराखंड में शराब की बिक्री होगी।

इस फैसले के बाद अब मंडी परिषद से शराब बेचने के अधिकार छीन लिए गए हैं। इतना ही नहीं ओवररेटिंग शराब बेचने वालों पर एक प्रतिशत जुर्माना वूसला जाएगा।

राज्यपाल ने बदली कांग्रेस सरकार की आबकारी नीति

केके पॉल - फोटो : AmarUjala
कांग्रेस के शासनकाल में करीब एक साल पहले लागू आबकारी नीति के एफएल-2 लाइसेंस प्रावधान को राज्यपाल ने पलट दिया गया है। प्रदेश में 2014-15 की आबकारी नीति को पुन: लागू कर दिया गया। मंगलवार को हुए इस आमूलचूल परिवर्तन के तहत विवादित और चर्चित आबकारी की एफएल- टू नीति में मंडी परिषद के साथ किया पांच वर्ष का करार समाप्त हो गया है। 

फैसले से जहां शराब कारोबार में मंडी परिषद का एकाधिकार समाप्त हो गया है, वहीं अब शराब निर्माता कंपनियों के लिए बाजार में प्रतिस्पर्धा के रास्ते खुल गए हैं। नई आबकारी नीति ने राज्य की बीयर निर्माता कंपनियों को भी झटका दे दिया है। 

नई नीति के तहत बीयर निर्माता कंपनियों को प्रत्येक जिले में आउटलेट खोलने की इजाजत नहीं होगी। यानी अब आबकारी विभाग की ओर आवंटित शराब की दुकानों पर ही बीयर बेची जा सकेगी।

250 से अधिक ब्रांड्स की शराब होगी मुहैया
प्रमुख सचिव आबकारी डॉ. रणवीर सिंह के मुताबिक नई आबकारी नीति लागू होने के बाद जहां राज्य में शराब के नामीगिरामी ब्रांड्स समेत 250 से अधिक ब्रांड्स की शराब मुहैया होगी, वहीं शराब निर्माता कंपनियां मन मुताबिक कारोबार कर सकेगी। कारण कि नई व्यवस्था के तहत ब्रांड की बाजार में जितनी मांग होगी, शराब निर्माता कंपनियां उतनी शराब बेचने के लिए स्वतंत्र होगी। 

शराब निर्माण पर किसी भी प्रकार का कोई अंकुश नहीं होगा। नई आबकारी नीति में लाइसेंस शुल्क में बढ़ोत्तरी कर दी गई है। एफएल टू लाइसेंस के लिए शराब निर्माता कंपनियों को छह लाख रुपये लाइसेंस शुल्क जमा कराना होगा। ज्ञात हो कि इससे पूर्व कंपनियोें को लाइसेंस शुल्क मद में पांच लाख जमा कराना होता था। 

नई आबकारी नीति में निर्धारित दर से अधिक कीमत पर शराब बेचने वाले कारोबारियों पर शिकंजा कसा गया है। नई नीति के मुताबिक पहली बार निर्धारित दर से अधिक कीमत पर शराब बेचते हुए पकडे़ जाने पर एक माह की अग्रिम जमा राशि में से एक फीसदी धनराशि या पांच हजार जुर्माना वसूला जाएगा। 

शराब निर्माता कंपनियों के मालिकों ने हाईकोर्ट की ली थी शरण 
दूसरी और तीसरी बार अधिक कीमत पर बेचने पकडे़ जाने की स्थिति में जुर्माने की राशि जमा अग्रिम धनराशि में से दो या तीन फीसदी होगी। उल्लेखनीय है कि हरीश रावत के शासनकाल में लागू की गई आबकारी नीति को लेकर जबरदस्त होहल्ला मचा था। 

सरकार की ओर से लागू आबकारी नीति के खिलाफ कई शराब निर्माता कंपनियों के मालिकों ने हाईकोर्ट की शरण ली थी और अदालत के आदेश पर इन कंपनियों के ब्रांड्स को बेचने की अनुमति मिली थी। इतना ही नहीं नई एफएल टू नीति के लागू होने के बाद राज्य में शराब के कारोबार में कमी आयी है। 

आबकारी विभाग के ही आंकड़ों पर गौर फरमाएं तो पिछले पांच साल में शराब कारोबार में लगातार गिरावट दर्ज की गई है। शराब के गिरते कारोबार को लेकर भी विपक्ष ने सरकार पर हमला बोला था। 
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यह थी आबकारी नीति में व्यवस्था 

- फोटो : demo
उत्तराखंड की वर्ष 2015-16 की आबकारी नीति में एफएल 2 का लाइसेंस राज्य मंडी परिषद को दिया गया था। परिषद ने दोनों मंडलों में एक एक सुपर स्टोर खोला। इन सुपर स्टोर से जीएमवीएन (गढ़वाल मंडल विकास निगम) और केएमवीएन (कुमाऊं मंडल विकास निगम) शराब खरीदते थे और प्रत्येक जनपद में उनके अपने छोटे स्टोर थे। 

निगमों के ही स्टोर से फुटकर विक्रेता को शराब खरीदनी पड़ती थी। राज्य मंडी परिषद के साथ आबकारी विभाग का समझौता पांच वर्ष के लिए था। हर वर्ष परिषद को सवा करोड़ रुपये लाइसेंस फीस जमा करवानी थी। 

लाइसेंस जारी करने के साथ सरकार ने यह शर्त लगाई है कि एक वर्ष के भीतर गढ़वाल और कुमाऊं में न्यूनतम 10 किलोलीटर क्षमता वाली दो वाइनरी स्थापित करनी है। यह दोनों वाइनरी पहाड़ी क्षेत्रों में खोली जानी है। 
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