उत्तराखंड में नई सरकार के गठन के लिए भाजपा और कांग्रेस के पक्ष में अलग-अलग एग्जिट पोल सामने आने से सियासी हलचल बढ़ गई है। अधिकतर एग्जिट पोल भाजपा की वापसी कर रहे हैं। किस पार्टी को बहुमत मिलेगा या फिर मिलीजुली सरकार बनेगी 10 मार्च को मतगणना के बाद स्थित स्पष्ट होगी। सरकार बनाने में हरिद्वार जिले की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका होगी। वजह जिले में प्रदेश की सर्वाधिक 11 सीटें हैं। हरिद्वार शहर और ग्रामीण समेत अधिकतर सीटें नजदीकी मुकाबले में फंसी हैं। इससे प्रत्याशियों की नींद उड़ी है।
सत्ता के गलियारे का रास्ता हरिद्वार होकर ही जाता है। हरिद्वार का अपना धार्मिक और राजनीतिक महत्व है। चुनाव मैदान में उतरने से लेकर सरकार गठन से पहले सियासतदार हरकी पैड़ी पर मां गंगा की पूजा करने धर्मनगरी ही पहुंचते हैं। भाजपा और कांग्रेस दोनों ही इस परिपाटी को आगे बढ़ाते आ रहे हैं। हरिद्वार शहर से खुद भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष मदन कौशिक तो हरिद्वार ग्रामीण से कैबिनेट मंत्री स्वामी यतीश्वरानंद की प्रतिष्ठा दाव पर लगी है। कौशिक अपना पांचवां और स्वामी हैट्रिक के लिए मैदान में जरूर हैं, लेकिन मुकाबला बेहद करीबी होने से उनकी नींद उड़ी है।
हरिद्वार ग्रामीण से कांग्रेस की अनुपमा रावत का भविष्य भी इस चुनाव से तय होगा। अनुपमा रावत पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की बेटी हैं। सक्रिय राजनीतिक जीवन का पहला चुनाव भी लड़ रही हैं। ग्रामीण विधानसभा सीट से ही 2017 में तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत स्वामी से हार चुके हैं। शहर और ग्रामीण में कांग्रेस और भाजपा के बीच कांटे की टक्कर है। 14 फरवरी को हुए मतदान में मतदाताओं की खामोशी से राजनीतिक सूरमा भी हार-जीत का सटीक पूर्वानुमान लगाने में बच रहे हैं। रानीपुर और ज्वालापुर विधानसभाओं में भी कांग्रेस और भाजपा प्रत्याशियों ने शानदार चुनाव लड़ा है। हार जीत को लेकर हर किसी के अपने कयास हैं।
खानपुर, लक्सर और भगवानपुर सीट से बसपा ने त्रिकोणीय मुकाबला बनाया है। राज्य में बसपा का खाता खुलता है तो हरिद्वार जिले से इसकी शुरुआत होगी। राज्य गठन के बाद भी बसपा ने हरिद्वार जिले से शानदार प्रदर्शन किया। लेकिन 2017 में अपनी कोई भी सीट नहीं बचा सकी। 2022 के चुनाव में बसपा की कम से कम दो सीटें आने की संभावना लगाई जा रही है। ऐसे में कांग्रेस या भाजपा को पूर्ण बहुमत नहीं मिलने की स्थिति में बसपा निर्णायक भूमिका में रहेगी। जिले की अन्य सीटों पर भी भाजपा-कांग्रेस के बीच हार-जीत बेहद करीबी होने से प्रत्याशियों और समर्थक बेचैन हैं।