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आश्रमों ने किया बहिष्कार

Fri, 24 Feb 2017 10:38 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो हरिद्वार
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स्वामी अच्युतानंद के अभिषेक समारोह में किसी अखाड़े और आश्रम में से कोई साधु संन्यासी व महामंडलेश्वर नहीं पहुंचा। हरिद्वार के संतों ने पूरी तरह समारोह का बहिष्कार किया। हरिद्वार के किसी नेता, अधिकारी और आम आदमी भी समारोह में शामिल नहीं हुआ। समारोह स्थल पर अधिकतर कुर्सियां खाली पड़ी रही।    
 
अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद और द्वारिका के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती आयोजन को अवैध घोषित कर चुके हैं। अखाड़ा परिषद ने चेतावनी दी थी कि यदि कोई भी संत इस आयोजन में जाएगा तो उसे संत समाज से बहिष्कृत कर दिया जाएगा। अखाड़े ने कहा था कि यदि किसी कार्यक्रम में ऐसा संत आमंत्रित किया गया तो उस आयोजन में भी साधु-समाज भाग नहीं लेगा। इस घोषणा का असर आयोजन में दिखाई दिया। यहां तक कि भूमा पीठ से सटे कई आश्रमों के संतों ने भी कार्यक्रम में भाग नहीं लिया। स्वामी अच्युतानंद ने दंडी बाड़े के दंडी साधुओं को बुलाकर भीड़ जुटाई। काशी से आए पांच संत ही भगवा वेश में नजर आए। जहां तक काशी विद्वत परिषद की बात है, काशी में करीब दो दर्जन विद्वत परिषद चल रही हैं। इस आयोजन में काशी पंडित सभा के विद्वान पंडितों ने भाग लिया। ये सभी पंडित संस्कृत भाषा में वार्तालाप कर रहे थे।    
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अद्भुत मंदिर के मंच से स्वामी नरेंद्रानंद सरस्वती सहित काशी के सभी संतों और पंडितों ने कहा कि श्रृंगेरी, गोवर्धन और ज्योर्ति पीठ पर विराजमान भारती तीर्थ, निश्चलानंद सरस्वती व स्वरूपानंद सरस्वती अनाधिकृत रूप से बैठे हुए हैं। उन्हें अपने पद तीन वर्ष में छोड़ देने चाहिए। ऐसा न होने पर विद्वानों की परिषद तीनों पीठों पर नए शंकराचार्यों के नामों की घोषणा कर देगी। विद्वानों ने कहा कि स्वरूपानंद दो पीठों पर बैठे हुए हैं,  जबकि किसी भी शंकराचार्य को दो पीठ पर बैठने का अधिकार नहीं है।

बहिष्कृत होंगे अच्युतानंद और अन्य संत
अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष श्रीमहंत नरेंद्र गिरी ने कहा कि स्वयं भू शंकराचार्यों के खिलाफ अखाड़ा परिषद सख्त कार्रवाई करेगी। चेतावनी के बावजूद अच्युतानंद ने स्वयंभू शंकराचार्य बनने का लोभ संवरण नहीं किया। अब अखाड़ा परिषद अच्युतानंद सहित उन सभी संतों को बहिष्कृत करेगी जो आयोजन में गए हैं। अखाड़ा परिषद की बैठक शीघ्र बुलाई जाएगी।    

श्रीमहंत नरेंद्र गिरी ने प्रेस को जारी बयान में कहा कि हरिद्वार और अन्य तीर्थों के संतों ने जिस प्रकार कार्यक्रम से दूरी बनाई, वह स्वागत योग्य है। वह सभी अखाड़ों और आश्रमों के प्रति आभार व्यक्त करते हैं। हठधर्मिता अपनाते हुए स्वयंभू शंकराचार्य बने अच्युतानंद को संत समाज से बहिष्कृत किया जाएगा। उनका कृत्य पूर्णत: धर्म विरुद्ध है। शंकराचार्य बनना कोई गुड्डे- गुड़िया का खेल नहीं है। कोई भी व्यक्ति इस पद पर नहीं बैठ सकता। सनातन धर्म की परंपराओं का उपहास उड़ाने वालों के खिलाफ बेहद सख्त कार्रवाई की जाएगी।

अखाड़ा परिषद के राष्ट्रीय महामंत्री श्रीमहंत हरिगिरी ने कहा कि धर्मविरुद्ध आयोजित इस कार्यक्रम में जो भी गया है, उसे परिणाम भुगतने पड़ेेंगे। हरिद्वार नगरी आस्था की आध्यात्मिक राजधानी है। यहां से धर्म विरोधी संदेश को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। चेतन ज्योति आश्रम के महंत ऋषिश्वेरानंद ने कहा कि य िसनातन धर्म पर बड़ा आघात है। स्वयंभू होकर कोई साधु अपने को शंकराचार्य घोषित करता है तो यह सनातन धर्म को तोड़ना है। इससे समाज में कई विकृति उत्पन्न होती है। यह निदंनीय है।

अब और उलझ गया शंकराचार्य पीठों का विवाद
शंकराचार्य पीठों का विवाद एक और शंकराचार्य के अभिषेक के बाद कुछ और गहरा गया है। शास्त्रार्थ की दिग्विजय यात्रा के बिना ही अब शंकराचार्य बना दिए जाते हैं। बदलते दौर में संतों ने खुद दर्जनों पीठ स्थापित कर जगद्गुरु शंकराचार्य नाम अपने साथ जोड़ लिया है। यह सब शंकर मठाम्नाय और पीठ अनुशासन के विरुद्ध है।      
आद्य जगद्गुरु शंकराचार्य ने धरती पर उपलब्ध सभी शास्त्रों में पारंगत होने के उपरांत शास्त्रार्थ करते हुए दिग्विजय यात्रा निकाली थी। दक्षिण से पूरब, पश्चिम होते हुए वे उत्तर पहुंचे। जहां जहां भी विद्वान थे, उन सभी को शास्त्रार्थ करके परास्त किया। शंकर मठाम्नाय में आदि जगद्गुरु ने स्पष्ट लिखा है कि शंकराचार्य पद पर वही आसीन होगा, जो विद्वत परिषद को शास्त्रार्थ में पराजित करेगा।

यदि एक भी प्रश्न अनुत्तरित रह गया तो कोई पद का अधिकारी नहीं बन सकता। स्वयं आदि जगद्गुरु मंडन मिश्र की अध्यक्षता वाली काशी विश्व परिषद को परास्त करने के बाद तब शंकराचार्य पद से वंचित हो गए जब मंडन मिश्र की अर्द्धांगिनी के रूप में मां शारदा ने शंकर को चुनौती दी। उन्होंने कहा कि वे अपने पति का आधा भाग हैं और जब तक शंकर उन्हें परास्त नहीं करते, विजय नहीं मानी जाएगी। शारदा द्वारा गृहस्थ धर्म के बारे में पूछे गए सवालों का शंकर जवाब नहीं दे पाए। तब उन्होंने छह महीने का समय मांगा और परकाया प्रवेश कर गृहस्थ का ज्ञान हासिल किया। बाद में पुन: काशी जाकर शारदा को भी परास्त किया। तब कहीं शंकर जगद्गुरु शंकराचार्य के पद पर आसीन हो पाए।    
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आदि जगद्गुरु द्वारा रचित शंकर मठाम्नाय में स्पष्ट व्यवस्था दी गई है कि अपनी पीठ के क्षेत्र में शास्त्रार्थ के माध्यम से योग्यता स्थापित किए बगैर कोई भी संत शंकराचार्य पद पर आसीन नहीं हो सकता। उन्होंने उत्तर में ज्योर्ति पीठ, दक्षिण में श्रृंगेरी, पूर्व में गोवर्धन पीठ और पश्चिम में शारदा पीठ की स्थापना की थी। दशनाम संन्यासियों से कौन संत किस पीठ पर आसीन हो सकता है, इसका भी उल्लेख मठाम्नाय में किया गया है। पिछले करीब चार दशकों से परंपराओं का विघटन प्रारंभ हो गया। जैसे जैसे संत जगत का विस्तार होता गया, वैसे वैसे अनेक शंकराचार्य पीठ बढ़ती चली गई। इस समय करीब 22 पीठों पर शंकराचार्य बैठाए गए हैं। ये सब आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित परंपराओं के विरुद्ध हैं। अब तो उनके द्वारा स्थापित तीन पीठों पर भी कई कई शंकराचार्य समान पद पर आसीन हो गए हैं।
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