गायत्री के सिद्ध साधक शांतिकुंज के संस्थापक श्रीराम शर्मा आचार्य ने करोड़ों लोगों के जीवन में वसंत जगाया है। उनके द्वारा स्थापित अखिल विश्व गायत्री परिवार उनके बताए सूत्रों के माध्यम से भारत सहित 80 देशों में सामाजिक बुराइयों के खिलाफ अलख जगा रहा है। धर्म और संप्रदाय से ऊपर उठकर कार्य करने वाले आचार्य के इस परिवार में आज करोड़ों परिजन हैं जो स्वयं में सकारात्मक परिवर्तन लाने के साथ ही अन्य लोगों में बदलाव लाने का काम कर रहे हैं।
पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य के आध्यात्मिक जन्मदिवस वसंत पंचमी की पूर्व संध्या पर गायत्री परिवार के प्रमुख डा. प्रणव पंड्या ने उनके जीवन के कुछ महत्वपूर्ण पलों को अमर उजाला के साथ साझा किया। डा. प्रणव पंड्या के अनुसार इतिहास में कभी-कभी ऐसा होता है कि अवतारी सत्ता एक साथ बहुआयामी रूपों में प्रकट होती है और उद्धार के लिए सबके मनों का नए सिरे से निर्माण करती है। आचार्यश्री के इस परिवार को एक ऐसी ही सत्ता के रूप में देखा जा सकता है। 20 सितंबर 1911 को आगरा जनपद के आंवलखेड़ा गांव में राजपुरोहित पंडित रूपकिशोर शर्मा और दानकुंवरी देवी के घर जन्मे आचार्य को महज 15 वर्ष की आयु में वसंत पंचमी 20 जनवरी 1926 को उनके गुरु स्वामी सर्वेश्वरानंद महाराज ने दर्शन दिए और इस जीवन के लक्ष्य का बोध कराया। तभी से आचार्य का जन्मदिन वसंत पंचमी को मनाया जाता है।
डा. पंड्या के अनुसार आचार्य श्री ने 1935 में महर्षि अरविंद, महर्षि रमण और महात्मा गांधी से मिलने के बाद पत्रकारिता को अपनाया। अपने लेखों से उन्होंने अंग्रेज हुकूमत के खिलाफ आवाज बुलंद की। स्वतंत्रता संग्राम में बढ़ चढ़कर भागीदारी की और अपने क्षेत्र के कई आंदोलनों का नेतृत्व भी किया।
आजादी के बाद उन्होंने सांस्कृतिक पुनरुत्थान के लिए मथुरा में गायत्री तपोभूमि की स्थापना की। मानव में देवत्व और धरती पर स्वर्ग के अवतरण का आदर्श स्थापित करने के लिए बुराइयों के विनाश और लोगों को रचनात्मक कार्यों से जोड़ने के लिए कार्य किया। उन्होंने ब्राह्मणत्व का असली सूत्र अपने लिए कठोरता, दूसरों के लिए उदारता के आदर्श को न अपनाने के साथ ही लाखों लोगों को भी इसे अपनाने के लिए प्रेरित किया।
आचार्य श्री ने समाज पर छाई कुरीतियों का विरोध करते सशक्त समाज बनाने के लिए व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण का संकल्प लिया । वे ज्ञानयज्ञ की मशाल लेकर खड़े हो गए। नैतिक, बौद्धिक और सामाजिक क्रांति का सूत्रपात किया। उन्होंने कहा कि आचार्यश्री ने संस्कारों की परंपरा के पुनर्जीवन, मानव में देवत्व के उदय का कार्य के लिए अथक परिश्रम किया। डॉ. पंड्या ने बताया कि आचार्य ने अपने जीवन का उत्तरार्द्ध हरिद्वार में बिताया। यहां साधना सत्रों तथा प्रशिक्षण केंद्र के रूप में शांतिकुज को विकसित किया। अपनी 32 सौ से अधिक पुस्तकों में से अधिकतर किताबों का लेखन यहीं किया। साथ ही विज्ञान और अध्यात्म के समन्वयात्मक प्रतिपादनों पर शोध के लिए विश्व की एकमात्र अनूठी प्रयोगशाला ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान की स्थापना की। उनके आदर्श मानवमात्र के लिए सदैव प्रेरणादायी हैं।