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उत्तराखंडः चेतावनी के बाद भी बचाव के संतोषजनक तरीके नहीं

Fri, 05 Jul 2013 09:00 AM IST
अजित सिंह राठी
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प्रदेश में पहाड़ से लेकर मैदान तक शुक्रवार और शनिवार को भारी बारिश के अल्टीमेटम के बीच शासन स्तर पर इसके निपटने के लिए संतोषजनक तैयारियां नहीं दिख रही हैं।
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जिलों में भी कलेक्टरों के पास ऐसे कोई संसाधन या प्रशिक्षित लोग नहीं हैं जिनसे आपदा से पहले ही बचाव के तरीकों पर कारगर तरीके से काम किया जा सके। संचार का कोई पुख्ता और वैकल्पिक तंत्र न होने से केदारघाटी जैसे जलप्रलय की स्थिति में और संपर्क से कटे इलाकों में तबाही को लेकर कयासबाजियां करने के अलावा और कोई रास्ता नहीं है।

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जानकार सेटेलाइट फोन सिस्टम का नेटवर्क खड़ा करने और एडवांस वॉर्निंग सिस्टम की जरूरत जताते हैं।मौसम विभाग के अलर्ट में किसी निश्चित स्थान के बजाय एरिया होने से भी रणनीति बनाने में दिक्कत होती है। जनता को सचेत करने के लिए पुराने जमाने के परम्परागत माध्यम हैं। पुलिस, पटवारी से लेकर आरटीओ तक को संचार के माध्यमों से ही सचेत किया जाता है।
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डिजास्टर मैनेजमेंट भी डांवोडोल
राजधानी से लेकर जिलास्तर तक डिजास्टर मैनेजमेंट का काम डांवोडोल है। शासन स्तर पर बने विभाग में बस एक सचिव और एक अनुसचिव है। सचिव आपदा का डाटा कलेक्शन करने में व्यस्त रहे और अनुसचिव की डयूटी रेस्क्यू के लिए जौलीग्रांट पर रही।

महकमें में अपर सचिव व संयुक्त सचिव तक नहीं। जिलों में भी हाल बुरा है। जिला आपदा प्राधिकरण सफेद हाथी बन गए। इसके अध्यक्ष तो कलक्टर है लेकिन बाकी लोग कौन हैं किसी को खबर नहीं। ना पर्याप्त मानव संसाधन और ना ही एक्सपर्ट्स।

मौसम विज्ञानियों के साथ समन्वय बढ़ाने की जरूरत है। प्रदेश में कहीं भी रेस्क्यू शैल्टर प्वाइंट नहीं है, ताकि लोग समय आने पर खुद को बारिश या अन्य आपदा से बचा सके। कई बार हैवी रेन की चेतावनी आती है लेकिन प्रभावित एक ही तहसील होती है। बारिश का पूर्वानुमान लोकलाइज नहीं होता।
-बिजेंद्र पाल, रिटायर्ड आईएएस

मौसम विभाग के अलर्ट से ही काम चलने वाला नहीं है। इसके लिए अन्य विभागों के साथ समन्वय भी किया जाना चाहिए ताकि अलर्ट पर त्वरित गति से काम हो सके। प्रशासन को किसी भी तरह की चेतावनी पर इन विभागों को साथ लेकर काम करना चाहिए।
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- पीके मिश्र, एक्सपर्ट
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