उत्तराखंड में सर्दी दस्तक दे चुकी है पर आपदा के मारे लोग अब भी छत की आस में बैठे हैं। कई पीड़ित तो टेंट में रहने के लिए मजबूर हैं।
अब तक उपलब्ध नहीं कराए रेडीमेड मकान
हाल ये है कि सरकार अपने किए वादे के अनुसार एक भी आपदा प्रभावित को प्री फेब्रीकेटेड (रेडीमेड मकान) अब तक उपलब्ध नहीं करा पाई है। प्रभावितों के लिए बनाए जाने वाले रेडीमड मकान की राह में रोड़ा बनी है जमीन।
आपदा के करीब पांच माह बाद भी शासन और प्रभावित जमीन के झगड़े में उलझे हैं। यह हाल तब है जबकि केंद्र सरकार ने भी भरोसा दिलाया था कि जल्द आपदा प्रभावित गांवों को वन भूमि की जमीन उपलब्ध करा दी जाएगी।
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भ्यूंदार और पुलना गांव के लोगों के हाल बहुत बुरे हैं। ये गांव विस्थापन की जद में हैं और करीब 99 परिवारों के लिए अदद जमीन की तलाश है। इस कारण इन लोगों के मकान भी नहीं बन पा रहे हैं।
सुरक्षित जमीन नहीं मिल पा रही
इसी तरह चौमासी और गोंदार के लोग हैं जो वन भूमि से घिरे हैं और उन्हें भी एक घर बनाने के लिए सुरक्षित जमीन नहीं मिल पा रही है। भ्यूंदार गांव के विक्रम सिंह के मुताबिक उनसे कहा जा रहा है कि सुरक्षित जमीन बताओ तो मकान बना दिए जाएंगे।
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गांव के लोग जोशीमठ में रहने को विवश है। गांव के लोगों को एकमुश्त पैसा ही दे दिया जाता तो भी बात बनती। शासन का कहना है कि मकान के लिए पैसा भी किस्तों में दिया जाएगा।
शासन के अनुसार, एकमुश्त पैसा इसलिए नहीं दिया जा सकता क्योंकि वर्ल्ड बैंक इस योजना को फाइनेंस कर रहा है और फाइनेंस बैंक की शर्त पर होगा।
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