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दशहरे पर बेटियों का इंतजार वरना नहीं रुकेगा ‘गागली युद्घ’

Wed, 09 Oct 2013 10:11 PM IST
सूपा सिंह बिष्ट/अमर उजाला, साहिया
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इन दिनों नवरात्र में जहां देशभर में रामलीलाओं और डांडिया की धूम है वहीं जौनसार बावर का एक गांव उत्पाल्टा ऐसा भी है जहां बड़े स्तर पर युद्ध की तैयारी चल रही है। यह युद्ध लड़ा जाता है गागली (अरबी) की डंठलों से।
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पौराणिक मान्यता है कि गांव को श्राप से मुक्ति दिलाने के लिए हर साल दशहरे पर गांव में इस युद्ध का आयोजन किया जाता है, स्थानीय भाषा में इसे पाइता पर्व कहते हैं।

गले मिलकर पर्व की बधाईयां
दशहरे के दिन दो घंटे तक पहले आपस में यह युद्घ होता है इसमें उत्पाल्टा और कुरोली गांव के लोग भाग लेते हैं, फिर एक दूसरे को गले मिलकर पर्व की बधाईयां दी जाती हैं।
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नाच गाना भी होता है। इस युद्ध में भाग लेने के लिए दूर दराज के गांव और शहरों में बसे स्थानीय लोग भी गांव आते हैं।

क्यों होता है युद्ध
मान्यता है कि सत्रहवीं सदी में उत्पाल्टा गांव की दो बहनें रानी और मुन्नी गांव से कुछ दूर क्याणी नामक स्थान पर कुएं से पानी भरने गई थी। रानी कुएं में गिर गई, मुन्नी रोती हुई घर पहुंची तो लोगों ने उसी पर बहन को कुएं में धकेलने का आरोप लगाया।

व्यथित होकर मुन्नी ने भी कुएं में छलांग लगा दी। तब से गांव के लोग बहुत व्यथित हैं और इसके पश्चाताप के लिए पाइता पर्व पर रानी और मुन्नी की मूर्तियों को कुएं में विसर्जित किया जाता है।

खत स्याण राजेंद्र सिंह राय के अनुसार जब तक दशहरा के दिन दो कन्याएं गुन्नी और रानी के पुनर्जन्म के रूप में गांव में पैदा नहीं हो जाती तब तक हर साल पाइता पर्व पर युद्ध का आयोजन होता रहेगा।
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