उत्तराखंड आपदा के बाद देशभर से जिस राहत सामग्री में कंबल, खाना, कपड़े और दूसरी चीजों के ट्रक भरकर आ रहे हैं, जमीनी तौर पर वह सामग्री पीड़ितों तक मुहैया ही नहीं हो पा रही है। हालात यह हैं कि लोग अब एक वक्त के खाने के लिए भी लड़ते हैं।
उनका घर उजड़ चुका है लेकिन इस त्रासदी के साथ ही अब उन्हें भूख की मार भी झेलनी पड़ रही है। छह दिन बाद फाटा से लौटे एसजीआरआर आईटीएस के एक दल ने कुछ ऐसे ही हालात बयां किए।
राहत दल के विरेंद्र पुंडीर ने बताया कि गांवों में लोग दो जून की रोटी के लिए आपस में झगड़ रहे हैं। जब दल कपानिया गांव पहुंचा तो देखा कि एक महिला ग्राम प्रधान कंबलों के लिए लड़ रही थी। वितरण करने वाले अधिकारी ने कागजों में तो 40 कंबल लिखे थे लेकिन उन्हें केवल 20 ही मिले थे।
उनके गांव में भी भारी तबाही हुई है। इसके अलावा राहत सामग्री को पहले नई टिहरी बांध के पास एक स्थान पर रोका जाता है। जैसे ही सामग्री का ट्रक यहां पहुंचता है तो मौजूद पुलिसकर्मी ट्रक खाली कराने का दबाव बनाते हैं।
जब यहां से बचकर वह आगे निकल गए तो गुप्तकाशी में भी ऐसे ही हालात नजर आए। यहां से आगे किसी को राहत सामग्री लेकर नहीं जाने दिया जा रहा है। एसजीआरआर के दल में विरेंद्र पुंडीर, विरेंद्र गुंसाईं, संदीप शर्मा, राकेश पंवार, कविंद्र बिष्ट, अंबिका मंमगाई और अजय शर्मा शामिल थे।
फेगू गांव में पसरा है सन्नाटा
चंद्रापुरी के साथ ही फेगू गांव पर भी आपदा का बुरा असर पड़ा है। राहत दल ने बताया कि फेगू गांव में रहने वाले 13 परिवार ऐसे हैं, जिनमें किसी ने किसी व्यक्ति की मौत हुई है। इस गांव के लोग केदारनाथ में पालकी और कंडी चलाने के लिए जाने जाते हैं। दल ने यह भी बताया कि चंद्रापुरी गांव पूरा ही साफ हो गया है।
इन गांवों पर दिखी सबसे ज्यादा मार
डीवली, नागजगई, खाट, लमगौंडी, बडैत, चंद्रापुरी, फेगू और बडासूं।