जंगलों की आग ने उत्तराखंड वन विभाग के सिस्टम की पोल खोल दी है। सवाल पैदा हो गया कि प्रदेश के 13 जिलों के लिए 92 आईएफएस की फौज है, लेकिन पद के अनुरूप जिम्मेदारी न मिलने से विभाग काम नहीं कर पा रहा है। वो भी ऐसे वक्त में जब जंगल वन माफिया और वन्य जीव तस्करों की गिरफ्त में है।
शासन अब तक चार बार सिविल सर्विस बोर्ड की बैठक निरस्त कर चुका है। अगर बैठक हो जाती तो सीनियर वन सेवा अधिकारियों की पद के लिहाज से जिम्मेदारी तय होती। इससे शासन की मंशा पर भी सवालिया निशान लग रहा है। प्रदेश के जंगलों में लगी आग ने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री की चिंता बढ़ा दी, लेकिन वन एवं पर्यावरण के अधिकारी इसे तीन-चार साल की सर्किल बता कर पल्ला झाड़ते रहे।
आग कैसे लग रही है? यह राज जब खुला जब 48 लोगों के खिलाफ जानबूझकर आग लगाने के मामले में कार्रवाई हुई। यह लोग कौन हैं? शासन ने इनकी पहचान स्पष्ट नहीं की। लेकिन शक की सुई वन माफिया की तरफ घूम गई। जंगलों से पेड़ काटकर बाजार में बेचे जा रहे हैं। इसका पता लगाने के लिए पूर्व वन मंत्री दिनेश अग्रवाल कई बार अफसरों को जांच के लिए कह चुके हैं।
वन्य जीव तस्करों का संजाल जंगलों में बड़ी मजबूती से फैला है। कस्तूरी मृग, गुलदार, बाघ को बाहर निकालने के लिए तस्कर भी जंगलों में आग लगाते हैं। राज्य वन्य जीव बोर्ड की बैठक में यह मामला उठ चुका है। इतना होने के बाद भी जंगलों को सुरक्षित करने के लिए सीनियर विभागीय अफसरों को जिम्मेदारी नहीं दी गई। एक अफसर के पास कई-कई पद हैं और कुछ अफसर खाली बैठे हैं।
राजाजी पार्क और कार्बेट के निदेशकों का वन संरक्षक स्तर के पद पर अपर प्रमुख वन संरक्षक स्तर के अधिकारी हैं और ग्रीन इंडिया मिशन जैसी परियोजनाएं खाली पड़ी हैं। शासन ने पदोन्नति देकर और ग्रेड बढ़ाकर अफसरों का मुंह तो बंद कर दिया, लेकिन पद ने देने से जंगल की सुरक्षा खतरे में पड़ी है।
आग से निपटने के बाद सिस्टम को सुधारने की दिशा में काम किया जाएगा। स्थिति की समीक्षा करके इसे सुधारा जाएगा जिससे आइंदा कोई दिक्कत न होने पाए।
- एस. रामास्वामी, अपर मुख्य सचिव