फोन पर उस शख्स की बातें सुनकर रोंगटे खड़े हो गए। रात पौने दो बजे फोन कर उसने बताया-मेरे गांव का नाम रिंगड़ा है। चमोली के थराली तहसील के देवाल ब्लाक में पड़ता है। मैं श्रीनगर में नौकरी करता हूं। 16 जून को जो आपदा उत्तराखंड में आई उसका असर मेरे गांव पर भी पड़ा।
घर जाने के लिए बने तीनों पुल ध्वस्त हो गए। गांव जाने की कोशिश नाकाम रही। भरोसा था कि सरकार कुछ करेगी लेकिन सब व्यर्थ। बीच-बीच में परिवार वालों से बातचीत हो जाती थी। तीन दिनों से बात भी नहीं हो पा रही थी। आज (28 जून) शाम 4 बजे के पत्नी का फोन लग गया।
मुंह से बोल नहीं फूटे, बस रोती रही। इस बीच बेटी ने फोन ले लिया और रोते हुए बोलने लगी...पापा आप हमें क्यों छोड़ गए...पिछले दो दिनों से हम पानी पी कर जी रहे हैं। आप कहते थे, सरकार आएगी? कोई नहीं आया। आप हमसे झूठ बोल रहे हो..आपने तो हमें यहां मरने छोड़ दिया है। हम सब भी अब डेड हो जाएंगे....इसके बाद फोन कट गया।
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क्या करूं, कहां जाऊं? परेशान हूं सर
तब से फोन मिला रहा हूं, लेकिन नहीं लग रहा है। क्या करूं, कहां जाऊं? परेशान हूं सर...आप कुछ करो। कहते हुए सुबकने लगता है...fफर वह पूछने लगता है सर! क्या मेरे बच्चों तक कोई खाना पहुंचाएगा? क्या आप मेरी मदद करेंगे? अमर उजाला फाउंडेशन इतने लोगों की मदद कर रहा है।
क्या आप मेरी मदद नहीं करेंगे? सर..प्लीज मेरे बच्चों को बचाइये, वह शख्स जार-जार रोने लगा। अब किसी का भरोसा नहीं रहा। .जंगल के रास्ते मुझे गांव पहुंचने में दो दिन लगेंगे...सुबह चल पड़ूंगा...लौट कर फोन करूंगा। उसके फोन का इंतजार है। दुआ करता हूं सब कुशल हो। आप भी दुआ करें।
(आपदा में फंसे अपने परिवार के बारे में एक शख्स ने जैसा एन अर्जुन को बताया)