केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की ओर से अनुमति नहीं मिलने और परियोजनाओं का निर्माण कार्य लटक जाने से जहां 1743 मेगावाट बिजली का उत्पादन अधर में लटका है। वहीं, सरकार को सालाना 2040 करोड़ रुपये राजस्व का नुकसान हो रहा है। सरकार, यूजेवीएनएल ने यह प्रकरण केंद्र सरकार के प्रोजेक्ट मॉनीटरिंग ग्रुप (पीएमजी) के समक्ष उठाया है। पीएमजी से जुड़े अफसरों ने प्रकरण को केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के समक्ष उठाकर निस्तारण में सहयोग की बात कही है।
उत्तराखंड जल विद्युत निगम ने वर्ष 2005-2006 के बीच 24 परियोजनाओं को मंजूरी दी। तमाम विभागों से अनुमति मिलने और डीपीआर तैयार होने के बावजूद इन योजनाओं में से 16 योजनाएं इको सेंसिटिव जोन के फेर में लटक गई। कारण, सभी जल विद्युत परियोजनाएं इको सेंसिटिव जोन में स्थापित की जा रही हैं।
जिन योजनाओं का निर्माण कार्य लटका है, उसमें जालंद्रीगाड़, सियानगाड़, काकोरागाड़, कारमोली, जाधगंगा, ऋषिगंगा फेस एक और दो जैसी बड़ी परियोजनाएं शामिल हैं। केंद्रीय वन एवं पर्यावरण की ओर से अनुमति नहीं मिलने और प्रकरण के अदालत में चले जाने की वजह से योजनाओं की स्थापना का काम पिछले कई साल से लटका पड़ा है।
यूजेवीएनएल के प्रबंध निदेशक एसएन वर्मा के मुताबिक 1062 करोड़ लागत की इन परियोजनाओं से 1743 मेगावाट बिजली उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है। इन योजनाओं के पूरा होने से सरकार को सालाना 2040 करोड़ का राजस्व मिलता। बकौल प्रबंध निदेशक वर्मा, जिन परियोजनाओं पर इको सेंसिटिव जोन का पेच है, उसमें 10 परियोजनाएं यूजेवीएनएल की हैं, जबकि सेंट्रल पब्लिक सेक्टर यूनिट (सीपीएसयू) और इंडेपेंडेंट पावर प्रोजेक्ट (आइपीपी) से जुड़ी तीन-तीन परियोजनाएं शामिल हैं।
उल्लेखनीय है कि यूजेवीएनएल समेत निजी क्षेत्र की 24 और ऐसी जल विद्युत परियोजनाएं हैं, जिन्हें लेकर सुप्रीमकोर्ट में सुनवाई चल रही है। इस प्रकरण में केंद्र सरकार के निर्देश पर विशेषज्ञों की 12 सदस्यीय समिति अपनी रिपोर्ट भी केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को सौंप चुकी है।