उत्तराखंड के जंगलों में लगभग तीन करोड़ टन चीड़ के पत्ते (पेरुल) भरे पड़े हैं। चार साल से जंगलों में पेरुल नहीं हटाया गया। जंगल में आग लगने पर पेरुल पेट्रोल की तरह काम करता है।
हालत यह है कि चीड़ के पेड़ काटने संबंधी अनुमति के लिए शासन न तो सुप्रीम कोर्ट गया और न ही इस संबंध में केंद्र को प्रस्ताव भेजा। अब जब जंगलों में आग धधक रही है तो चीड़ के पेड़ काटने के लिए वन अनुसंधान संस्थान से शोध करने के लिए कहा गया है। शोध पूरा होने के बाद चीड़ के पेड़ काटने के संबंध में प्रस्ताव तैयार किया जाएगा।
उत्तराखंड के जंगलों के 18 प्रतिशत भाग में चीड़ का कब्जा है। चीड़ के जंगल वनस्पतियों और वन्य जीवों के पनपने के लिए मुफीद नहीं है। इसके पत्ते आग को और भयावह बना देते हैं। इन पर चलकर लोग फिसल कर गिरते हैं।