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उत्तराखंडः जमीं पे हिमालय...मुसीबत में पहाड़

Sun, 14 Jul 2013 02:02 PM IST
सूर्यप्रकाश नौटियाल/ सुरेंद्र पुरी
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उत्तरकाशी जिला मुख्यालय से आठ किमी टैक्सी से और उसके बाद डिगिला में पेड़ गिराकर तैयार की गई जुगाड़ की पुलिया से असी गंगा पार की।
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नदी किनारे का रास्ता पकड़ कर आगे बढ़े तो बाढ़ से तबाह सड़क, क्षतिग्रस्त स्कूल और दरकते पहाड़ स्वागत करते हुए मिले। हर तरफ खौफनाक कहानी थी। करीब छह किमी पैदल चलकर संगमचट्टी पहुंचे।

असी गंगा घाटी के गांव पिछले वर्ष की तबाही से उभरे भी नहीं थे, कि इस बार की आपदा ने फिर उनके जख्म हरे कर दिए। पिछले वर्ष अगस्त की बाढ़ से बहे पुल, पुलिया, सड़क, संपर्क मार्ग को जुगाड़ कर चलने लायक बनाया था, लेकिन वह सब मौजूदा आपदा में तबाह हो गए।
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अब तो भूस्खलन से गांव का अस्तित्व ही खतरे में पड़ गया है। हम जब वहां पहुंचे तो ग्रामीणों ने कहा सरकार सुध लेती नहीं। अब हम करें तो क्या करें। तीन अगस्त 2012 के पहले तक क्षेत्र का व्यापारिक केंद्र रहे इस स्थान पर अब सिर्फ छप्पर डालकर बनी एक-दो चाय की दुकान ही है।

यहां चाय का गिलास हाथ में थमाते हुए प्रताप सिंह ने बताया कि पिछले वर्ष की बाढ़ में सब तबाह हो गया था। सरकार से जो मुआवजा मिला, उसमें सिर्फ यह छप्पर ही डाल सका। कठिन पगडंडियों के सहारे आगे बढ़ते ही ग्रामीणों की दुश्वारियां समझ में आने लगी।

रास्ते जगह-जगह धंसे थे, तो पहाड़ असी गंगा का प्रवाह रोकने को बढ़ रहे थे। इन्हें लांघ भंकोली पहुंचे तो आपदा प्रभावित अपना दुखड़ा सुनाने लगे। ममता ने बताया कि बीते साल की आपदा में मकान ढहने के बाद से वह सात सदस्यीय परिवार के साथ पशुपालन विभाग के भवन में शरण लिए हुए हैं, मदद के बजाए प्रशासन उन्हें भवन खाली करने को कह रहा है।

बाजार तक पंहुचाने के रास्ते बंद
नरेंद्र सिंह बताते हैं कि पूरी रात घरों पर मंडरा रहे खतरे की चौकसी में गुजर रही है। समस्या सिर्फ घर मकान की नहीं बल्कि आजीविका की भी है। खेतों में आलू की फसल तैयार है। लेकिन इसे बाजार तक पहुंचाने के रास्ते बंद हैं।
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ध्वस्त पड़े रास्तों से इसे शहर तक ले जाने में ढुलान भाड़ा इतना लग जाएगा कि लागत भी नहीं मिलेगी। रास्ते ठीक हो जाएं तो किसी तरह वह अपनी आजीविका चला लेंगे।
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