उत्तराखंड की सियासत में यह पहला मौका है, जब नेता एक-दूसरे को नीचा दिखाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं।
हालांकि राज्य में जनप्रतिनिधियों के बीच आरोप-प्रत्यारोप को लेकर अक्सर जुबानी जंग होती रही, पर कभी ऐसे हालात नहीं बने, जिससे कटुता पैदा हुई हो। ऐसे में पुलिस को आशंका है कि कहीं जनप्रतिनिधियों के कट्टर समर्थकों के बीच टकराव न हो जाए। इसे देखते हुए पुलिस ने एहतियातन जिला स्तर पर कट्टर समर्थकों को चिह्नित करने का काम शुरू कर दिया है। ताकि उन पर नजर रखी जा सके।
उत्तराखंड की सत्ता में बदलाव कई बार हुए, पर कभी ऐसी नौबत नहीं आई कि जनप्रतिनिधि एक दूसरे के दुश्मन बनकर सामने खड़े हों। 18 मार्च से शुरू हुई सत्ता बदलाव की लड़ाई थमने के बजाए बढ़ती ही जा रही है। भाजपा, कांग्रेस और बागी विधायकों के हमलों में किसी तरह की कमी नहीं आई है। कानूनी लड़ाई के साथ एक दूसरे को राजनीतिक स्तर पर हाशिए पर लाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी जा रही है।
रावत के स्टिंग के बाद विधायकों की खरीद-फरोख्त को लेकर आए कांग्रेस विधायक मदन बिष्ट के स्टिंग ने इस लड़ाई को और हवा देने का काम किया है। ऐसे में पुलिस और खुफिया तंत्र को यह डर सता रहा है कि कहीं समर्थक आपस में ना उलझ जाए। इन झगड़ों के आगे चलकर रंजिश का रूप लेने से भी इनकार नहीं किया जा सकता है। प्रदेश की राजनीति में आई कड़वाहट आगे क्या गुल खिलाएगी, यह तो भविष्य के गर्भ में है। पर यह किसी भी स्थिति में उत्तराखंड और यहां के बाशिंदों के लिए ठीक नहीं है।
विधायक चाहेंगे तो मिल जाएगी एस्कॉर्ट
दस मई को विधानसभा जाने के लिए यदि कोई विधायक मांग करेगा तो उसे एस्कॉर्ट उपलब्ध करा दी जाएगी। एहतियात के तौर पर फिलहाल यमुना कालोनी और विधायक आवास पर गारद उपलब्ध करा दी गई है। सुप्रीम कोर्ट के सुरक्षा उपलब्ध कराने के आदेश के बाद पुलिस लगातार जनप्रतिनिधियों के संपर्क में है।