उत्तराखंड के सियासी घटनाक्रम का पटाक्षेप क्या होगा? यह पहेली अब राजनीतिक विश्लेषकों के दायरे से बाहर हो चली है।
हरीश को बहुमत साबित करने से रोकने के लिए भाजपा के भीतर एक समानांतर विचारधारा काम कर रही है। उत्तराखंड में यूपी की 2001 की कहानी भी दोहराई जा सकती है। यह भी हो सकता है कि विधानसभा भंग करने का दबाव बनाने के लिए भाजपा के सभी विधायक सामूहिक रूप से इस्तीफा सौंप दें। हालांकि इस हथियार को भाजपा अंतिम क्षणों में इस्तेमाल करेगी।
अभी तक विधायकों का अंकगणित स्पष्ट नहीं है, लेकिन फिर भी भाजपा के लंबरदारों में गजब के जोश का राज समझ से परे है। राज्य की राजनीति में इस समय गजब की गरमाहट है। कथित स्टिंग के आने के बाद तो हालात असाधारण तरीके से बदले हैं।
हरीश रावत को सत्ता तक पहुंचने से रोकने में जुटी भाजपा क्या मैकेनिज्म तैयार कर रही है, इसकी किसी को खबर नहीं है, लेकिन हरीश को रोकने के लिए सारे तौर तरीके अपनाएं जाएंगे। 2001 में यूपी में समाजवादी पार्टी के सौ विधायकों ने सदन से एक साथ इस्तीफा दिया था, कांग्रेस को फिलहाल सत्ता में आने रोकने के लिए भाजपा यह हथकंडा भी अपना सकती है, ताकि विधानसभा भंग करना मजबूरी हो जाए।
हालांकि ऐसा होने पर विधानसभा भंग होने की कोई बाध्यता भी नहीं है। उधर, बसपा के दो विधायकों व सोमेश्वर से कांग्रेस विधायक रेखा आर्य पर भाजपा को पूरा भरोसा हो चला है। सूत्रों की मानें तो बसपा सुप्रीमो से भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व की बात हो चुकी है। कुल मिलाकर यह संख्या तीन से आगे बढ़ती नहीं दिख रही है।
इतना जरूर है कि जिन विधायकों का आज के स्टिंग में नाम आया है, वे भी अब सीबीआई की रडार पर आ गए हैं। कुल मिलाकर भाजपा फ्लोर टेस्ट के दौरान अपनी जीत को लेकर आश्वस्त दिख रही है, लेकिन फिलहाल कोई यह समझाने को तैयार नहीं है कि इस जीत के लिए क्या तरकीब निकाली है।