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सवाल पूछ रही जिंदगियां, तबाही का जिम्मेदार कौन?

Thu, 20 Jun 2013 09:32 PM IST
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क
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रास्तों में फंसे हजारों लोग और पत्थरों के नीचे दबी जिंदगियां अब सवाल कर रही हैं कि इस तबाही का जिम्मेदार कौन है?
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माना कि कुदरत का कहर है, लेकिन क्या राहत-बचाव अभियान की यही रफ्तार होनी चाहिए, जो पांच दिन में यह नहीं बता पा रही कि जानमाल का आखिर कितना नुकसान हुआ है?

अमर उजाला ने अपने पाठकों से सवाल किया था कि क्या इसे प्राकृतिक आपदा मानकर पल्ला झाड़ लिया जाए या लापरवाह सरकार कटघरे में खड़ी की जाए?

उत्तराखंड की तबाही पर संपूर्ण कवरेज देखने के लिए क्लिक करें

पाठकों ने इस अहम बहस में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और अपनी कीमती राय हमें भेजी। पाठकों की चुनिंदा प्रतिक्रियाएं इस प्रकार हैं---

कुदरत के आगे किसी की नहीं चलती। पीड़ितों को राहत पहुंचाने में हमें सरकार की मदद करनी चाहिए।
@विनोद जोशी

ये लोग हेलीकॉप्टर से हवाई सर्वेक्षण कर रहे हैं तो हवाई माध्यम से लोगों को निकाल क्यों नहीं रहे हैं। पूरी तरह से सरकार की नाकामी है।
@अमित श्रीवास्तव

यह कुदरत का कहर है।
@मोहम्मद मिराज फारुक

कुदरत के कहर को कौन टाल सकता है, लेकिन सरकार की लापरवाही इस आपदा के लिए ज्यादा जिम्मेदार है। अब सरकार की जिम्मेदारी बनती है कि पीड़ितों के पास हर तरह की मदद पहुंचाई जाए।
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@दिनेश कुमार शर्मा

हर बात के लिए सरकार को दोष देना अच्छी बात नहीं है।
@तरुण जैन

जहां तक मैं समझता हूं, यह एक प्राकृतिक आपदा है। इसमें सरकार क्या, हम और आप भी कुछ नहीं कर सकते। भारी गर्मी के चलते मानसून इतनी जल्दी आएगा, किसे पता था। मैंने अपनी उम्र में पहली बार बारिश का इतना प्रलयकारी रूप देखा है। ऐसी आपदा का पता लगा पाना और उससे बचने के लिए अचानक इतना बड़ा राहत का काम करना आसान काम नहीं है। इसलिए सरकार को थोड़ा समय लग रहा है। अब हमारे जवान अपनी जान जोखिम में लिए राहत कार्य में लगे तो हैं।
@नितिश सिंह ठाकुर

केंद्र सरकार और राज्य सरकार लोगों की जिंदगी और मौत पर राजनीति करती है। ऊपर से मंदिर को हर साल लाखों करोड़ रुपया जाता है। फिर भी मंदिर को अभी तक ठीक से नहीं बनवा पाए, जबकि इतना प्रसिद्ध मंदिर है। पैसा मंदिर के कर्मचारी खा जाते हैं, वहां भी बिजनेस होता है। मौसम विभाग ने बताया था बारिश के बारे में, कब और कहां बारिश होगी, फिर भी लोग वहां गए।
@डॉ. दीपक

कुदरत के कहर पर तो इंसान का वश नहीं है, लेकिन आपदा के बाद राहत के लिए मिले धन का सही उपयोग ना होना सरकार की नाकामी जरूर है। जिन्हें एक अदद कफन भी नसीब नहीं होता, उनके नाम पर मिले धन को भी हजम करने में शर्म नहीं आती सरकार ओर उसके कारिंदों को।
@बद्री नाथ चौबे

दोस्तों, नदी हमारे बीच नहीं आई है, बल्कि हम ही उसके बीच पहुंच गए थे। उसने तो बस अपनी जमीन वापस ले ली, जोकि हम लोगों को अच्छा नहीं लगा।
@सौरभ गुप्ता

जो हुआ, अच्छा नहीं हुआ।
@सुनील कुमार

सरकार की लापरवाही
@गोपाल सिंह राणा

हमारी सरकार के पास किसी भी आपदा से निपटने के लिए कोई इंतजाम नहीं है। वो तो इंतजार करते हैं कि कहां से कितनी मदद आएगी और फिर हम उसमें से कितना पैसा गबन करेंगे।
@मोहम्मद सलीम

बेशक हम भी गढ़वाल में रहते हैं, लेकिन आप हमारे गांव के चारों तरफ फैले हरे-भरे पेड़ देखकर ये नहीं कह सकते कि पहाड़ के लोगों ने बांध बनाए हैं और जंगल काटे हैं। आज जो व्यक्ति या परिवार गांव में रहते हैं, मुश्किल से उसके पास 2-4 कमरे होते हैं और वे इन्हीं सीमित साधनों में जीवन यापन करते हैं। आज गांव में ज्यादा गरीब लोग ही रहते हैं, उनकी जीविका का स्रोत पशुपालन व खेती है, विशालकाय बांध नहीं।
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@पंकज पेटवाल

आप लोग हर काम के लिए सरकार को ही दोषी क्यों ठहराते हो। कभी तो बिना राजनीति के बात किया करो। उत्तराखंड और भारत की सरकार का धन्यवाद
@राजपाल पुनिया

बिल्कुल, हमारी सरकार तो बिल्कुल जिम्मेदार है। अभी तो उत्तराखंड में हादसा हुआ है पर सब एक दूसरे को कह रहे हैं, राजनीति कर रहे हैं। अगर सब राज्य सरकारें अपने राज्यों को ही संभाल लें तो कोई दिक्कत ना हो। हादसा तो कभी भी हो सकता है। इस हादसे के लिए आज हम सभी उत्तरदायी हैं। कारण, हमने प्रकृति को बर्बाद किया। बदले में उसने कहर दिखा दिया। यह खतरे की घंटी है। अभी भी हमें सतर्क हो जाना चाहिए और जो संभव प्रयास हों, करने चाहिएं। उत्तराखंड में बहुत बड़ी विपदा आई है। वहां सभी को उनकी सहायता करनी चाहिए।
@नीरा त्रिपाठी

बढ़ती जनसंख्या के चलते मानव के पास सर छुपाने के लिए जगह नहीं बची तो उसने नदी-नालों के तट पर घर बना डाले।
@प्रदीप त्रिवेदी

कोई बहस नहीं, अगर आप कर सकते हैं तो पीड़ितों की मदद कीजिए या जो लोग मदद कर रहे हैं, उन्हें मदद करने दीजिए।
@टीके मारवाह

कुदरत का कहर है, सरकार क्या फरिश्ते भेजेगी लोगों को बचाने के लिए। सरकार पीड़ितों की मदद कर रही है, उसे दोषी ठहराना गलत है।
@शाकिर खान

इस सरकार को कोई फर्क नहीं पड़ता है। सांसद और विधायक सोच रहे होंगे कि कब अनुदान मिले और बंदरबाट हो।
@नारायण अग्रवाल

जाहिर तौर पर यह सरकार की लापरवाही है, क्योंकि उन्हें पहले ही जानकारी दे दी गई थी, लेकिन फिर भी उन्होंने कोई कदम नहीं उठाया।
@प्राची सक्सेना
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