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सस्ता राशन लाने कौन जाए जब आने-जाने में ही 250 रुपये खर्च हो जाएं

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नेताओं का भविष्य तय करेगा चूका का यह प्राइमरी स्कूल। 14 फरवरी को इसी केंद्र में मतदान करेंगे ग्राम? - फोटो : TANAKPUR
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चूका (चंद्रशेखर जोशी)। चूका की समस्याओं का समाधान करने में चूकी सियासत। ये शब्द अविभाजित उत्तर प्रदेश से लेकर उत्तराखंड गठन के बाद राज्य की सत्ता संभालने वाली सरकारों की हकीकत बयां करते हैं। मूलभूत सुविधाओं की बात छोड़ दीजिए बात सस्ते राशन की करते हैं तो ग्रामीणों को इसे लाने के लिए 250 रुपये खर्च करने पड़ते हैं। क्योंकि 25 किलोमीटर दूर सस्ते गल्ले की दुकान तक जाने का किराया ही 125 रुपये है और आने में भी इतने ही खर्च होते हैं। ऐसे में लोग बाजार से महंगा राशन खरीदने के लिए मजबूर हैं। इस गांव की विकास से दूरी और सत्ता की अनदेखी से यहां पलायन भी बढ़ा है। 39 परिवार घटकर महज एक दशक में 25 रह गए हैं।
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संवाद न्यूज एजेंसी की टीम जब गांव पहुंची तो पास में ही 72 साल के सुंदर सिंह मिले। उनकी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है फिर भी राशन की दुकान से राशन नहीं लेना उनकी मजबूरी है। बुजुर्ग सुंदर कहते हैं कि चूका गांव के एपीएल कार्डधारकों के लिए ये सस्ता राशन महंगा सौदा है। ये नौबत सस्ते गल्ले की दुकान के गांव में नहीं होने से है। एक अदद सरकारी गल्ले की दुकान के लिए आवाज उठाते-उठाते थक चुके गांव वालों को चुनाव से पहले हर बार आश्वासन ही मिला लेकिन दुकान नहीं। गांव की यह अकेली परेशानी नहीं है, बल्कि एक बानगी भर है। बीएडीपी के बावजूद विकास से दूरी और समस्याओं के समाधान के बजाय टलामटोली करने वाले प्रतिनिधियों से उकता चुके यहां के 132 मतदाता 26 दिन बाद 14 फरवरी को होने वाले पांचवें विधानसभा चुनाव में वोट से माकूल जवाब देने के लिए कमर कस चुके हैं।
निर्माणाधीन टनकपुर-जौलजीबी सड़क पर टनकपुर से 30 किलोमीटर दूर खूबसूरत चूका गांव कालीगूंठ (पूर्णागिरि) ग्राम पंचायत का हिस्सा है। पहाड़ी जिले का यह मैदाननुमा गांव खेती के लिए मुफीद है लेकिन ग्रामीणों की मेहनत पर सूअर, हिरण और बारहसिंघा पानी फेर रहे हैं। सरकारी बंदोबस्त नहीं होने पर ग्रामीणों ने खुद लकड़ी और पत्थर की दीवार बनाई लेकिन इस तारबाड़ को लांघकर जानवर अब भी फसल को तबाह कर रहे हैं। 193 की आबादी है चूका गांव की लेकिन विडंबना यह है कि यहां का एक भी व्यक्ति सरकारी नौकरी में नहीं है। गांव की एक महिला जरूर प्राइमरी स्कूल में भोजनमाता है। इन सारी समस्याओं के बावजूद एक राहत इतनी है कि गांव में पानी की व्यवस्था बेहतर है। इसी तरह 2020 में जिओ के मोबाइल टावर लगने के बाद संचार सेवा में भी सुधार हुआ है।
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बिजली की लाइनें उजाला किए बिना ही हो गई ध्वस्त
चूका(चंपावत)। 2007 में बिछाई गई बिजली लाइन से कभी उजाला तो नहीं हुआ, लेकिन अब ये तार और खंभे भी धराशायी हो गए हैं। तीन साल पहले यहां सभी 24 परिवारों को सौर ऊर्जा दी गई लेकिन इसमें से भी पांच लाइटों ने जवाब दे दिया है। बिजली नहीं होने से यहां चक्की भी नहीं है। गेहूं पिसवाने के लिए 23 किलोमीटर दूर ऊचौलीगोठ जाना पड़ता है, जिसके लिए 50 किलो गेहूं पिसवाने के लिए 100 रुपये किराये में खर्च हो जाते हैं।
कक्षा पांच से आगे पढ़ने के लिए घर छोड़ना मजबूरी
चूका(चंपावत)। सब पढ़ें-सब बढ़ें से लेकर आरटीई की असलियत चूका में हांफ रही है। एकमात्र प्राइमरी स्कूल में फिलहाल 17 विद्यार्थी हैं, जिन्हेें पढ़ाने के लिए दो शिक्षक हैं। पांचवीं से आगे की पढ़ाई के लिए गांव के दरवाजे बंद हैं। गरीब और अनपढ़ होते हुए भी माता-पिता बच्चों के भविष्य की खातिर टनकपुर, बनबसा, चकरपुर किराए में रहकर पांचवीं से आगे की पढ़ाई करवा रहे हैं। इस वक्त सात बच्चे अपनी मां या पिता के साथ किराये में रह पढ़ रहे हैं। ग्रामीण बताते हैं कि पास में स्कूल नहीं होने का खामियाजा हर माह सात हजार रुपये से अधिक खर्च कर भुगत रहे हैं।
स्वास्थ्य विभाग का भवन कभी खुला ही नहीं
चूका(चंपावत)। स्वास्थ्य विभाग का भवन होने के बावजूद यहां सेहत की रत्तीभर सुविधा नहीं है। ग्रामीण कहते हैं कि ये केंद्र कभी खुला नहीं। सड़क में दो पुल अधूरे होने से 108 की एंबुलेंस सेवा भी दूर है। इमरजेंसी में 1500 रुपये में जीप बुक कर टनकपुर अस्पताल जाना पड़ रहा है। ऐसा वाकया तीन हफ्ते पूर्व 29 दिसंबर को पेड़ से गिरी संपत्ति देवी के साथ हुआ। संपत्ति के पांव में प्लास्टर और दवाओं मेें अब तक सात हजार रुपये खर्च हो चुका है।
विश्रामगृह में पानी नहीं
बीएडीपी से 2012-13 में चूका में एक यात्री विश्रामगृह बना लेकिन चार लाख रुपये से बने दो कमरों के इस विश्रामगृह में पानी की व्यवस्था तक नहीं है। आठ साल में पहली बार इन दिनों सड़क निर्माण करने वाले तीन श्रमिक इस विश्रामगृह में रुके हैं।
चूका गांव की मुख्य समस्याएं:
1.सरकारी सस्ते गल्ले की दुकान 25 किलोमीटर दूर सेलागाड़ में।
2.पांचवीं से आगे की पढ़ाई के लिए 30 किलोमीटर दूर टनकपुर जाने की मजबूरी।
3.कोई भी स्वास्थ्य सुविधा नहीं, 108 सेवा की एंबुलेंस का लाभ नहीं।
4.खेती के लिए आफत बन रहे जंगली जानवर से बचाव का कोई बंदोबस्त नहीं।
5.बिजली की लाइन नहीं होना।
क्या कहते हैं मतदाता:
हालात बदलने की उम्मीद के साथ पांच साल पहले बनबसा से 200 रुपये किराये में खर्च कर वोट देने के लिए गांव आई। लेकिन लोगों को प्राइमरी स्कूल के उच्चीकरण से लेकर एक भी सुविधा नहीं मिली। नेताओं के वादों पर अब भरोसा नहीं रह गया है। - ईश्वरी देवी।
नेता आते हैं, आश्वासन देते हैं लेकिन काम नहीं करते। सबसे बड़ी परेशानी खेतों को जंगली जानवरों से बचाने की है। आय नहीं होने के बाद भी ज्यादातर परिवारों के बीपीएल कार्ड नहीं बन पा रहे हैं। सरकारी गल्ले की दुकान दूर होने से लोगों को फायदा नहीं मिल पा रहा है। - सुंदर सिंह।
वोट देने से पहले वादे और बाद में मुकरना, ये इस गांव के साथ होता रहा है। लोगों को मनरेगा से भी काम नहीं मिल रहा है। स्वास्थ्य का भवन जब से बना है, बंद पड़ा है। कोई सुनने वाला नहीं। पांच साल में दो बार सत्ता से जुड़े नेता आए, लेकिन बदला कुछ नहीं। - प्रेम सिंह।
सौर ऊर्जा बरसात में अक्सर दगा देती है। टेलीविजन तो दूर, बरसातों की रात में एक बल्ब जला कर काम चलाना पड़ता हैं। रसोई गैस सिलिंडर का रिफिलिंग केंद्र दूर होने से भाड़े पर खर्च और परेशानी दोनों बढ़ रही है। - दिलीप सिंह।
सड़क का काम पूरा होने से जरूर लाभ होगा। लेकिन अभी गांव में समस्याओं का अंबार है। राशन की दुकान दूर है। गांव में लोगों के पास कोई रोजगार नहीं होने से माली हालत ठीक नहीं है। - दशरथ सिंह।
गांव में समस्याएं बहुत हैं लेकिन कोई सुध लेने वाला नहीं है। इलाज के लिए टनकपुर की दौड़, पांचवीं से आगे की पढ़ाई के लिए दौड़। आयुष्मान कार्ड भी नहीं बन सका है। - जानकी देवी, भोजनमाता।
गांव में पढ़े-लिखे लोग नहीं होने से जागरूकता की कमी है। इंटर तक स्कूल जरूर चाहिए। जिओ का टावर लगने से नेटवर्क की दिक्कत दूर हुई, इसका लाभ कोरोना काल में ऑनलाइन पढ़ाई में हुआ। - कपिल सिंह, ग्यारहवीं का छात्र।
चूका की ज्यादातर दिक्कतें बड़े स्तर की है। इन्हें लेकर कई बार विभिन्न मंचों से आवाज उठाई गई है। अलबत्ता पंचायत स्तर की समस्याओं को हल किया जाता है। सस्ते गल्ले की दुकान चूका में खोलने की कवायद की जा रही है। - मंजू देवी, ग्राम प्रधान, कालीगूंठ।
क्या कहते हैं अधिकारी:
चूका गांव में भवन बनने के बाद स्वास्थ्य केंद्र का अब तक उपयोग क्यों नहीं हुआ, इसकी जांच करा स्वास्थ्य विभाग से इसके संचालन के लिए कहा जाएगा। इसके अलावा शिविर लगा गांव को प्रशासनिक स्तर से सुविधा दी जाएगी। - हिमांशु कफल्टिया, एसडीएम, टनकपुर।
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