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कहीं कंकरीट के जंगल में न बदल जाए बनबसा

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बनबसा के फागपुर गांव की खेती। संवाद - फोटो : TANAKPUR
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विनोद काला
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बनबसा (चंपावत)। कृषि भूमि पर प्लॉटिंग कर आवासों के लिए जमीन बेचने से क्षेत्र में कृषि भूमि कम हो रही है। इससे भविष्य में कृषि उत्पाद के लिए खतरा बन सकती है। बनबसा में अधिकतर किसानों ने अपनी भूमि या तो सब्जी उत्पादकों को किराए पर दे दी है, या फिर बागान लगा ठेकेदारों के सुपुर्द कर दी है। खेती के लिए प्रसिद्ध बनबसा में कृषि भूमि को भवन निर्माण के लिए बेचने पर रोक लगाने की जरूरत महसूस की जा रही है।
क्षेत्र की फागपुर, भजनपुर, चंदनी, बमनपुरी, पचपकरिया, बनबसा, गुदमी एवं देवीपुरा आदि ग्रामसभाओं में 813.101 हेक्टेयर भूमि पर खेती होती थी। इस पर राजस्व विभाग लगान भी वसूलता है। क्षेत्र में करीब 24.636 हेक्टेयर वन भूमि, करीब 200 हेक्टेयर अन्य सरकारी भूमि पर भी खेती होती है। वर्ष 1965 से पहले करीब 1200 हेक्टेयर भूमि पर खेती होती थी लेकिन अब करीब 400 हेक्टेयर भूमि पर आवासीय भवन आदि बन गए हैं जबकि 300 हेक्टेयर भूमि पर बागान लग गए हैं। करीब 100 हेक्टेयर भूमि पर सब्जी का उत्पादन हो रहा है।
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राज्य बागवानी पुरस्कार से सम्मानित जिला पंचायत सदस्य पुष्कर कापड़ी और सबसे अधिक खेती वाले गढ़ीगोठ के किसान गजेंद्र सामंत का कहना है कि पूरी मेहनत के बाद भी कम मुनाफा होने के कारण नई पीढ़ी खेती से बच रही है। कृषक एवं गौरव सेनानी कल्याण समिति अध्यक्ष कैप्टन भानी चंद के मुताबिक कर्ज चुकाने के लिए भी कई किसान कृषि भूमि बेच रहे हैं।
पहले इतने रकबे में होती थी खेती
बनबसा (चंपावत)। वर्ष 1980 के दशक से पूर्व बनबसा क्षेत्र के फागपुर में 87.275 हेक्टेयर, बमनपुरी पचपकरिया में 580.1402, भजनपुर में 145.424 हेक्टेयर भूमि पर खेती की जाती थी। भैंसाझाला में 14.636 हेक्टेयर वनभूमि एवं अन्य स्थानों पर 10 हेक्टेयर भूमि पर भी खेती होती थी।
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कृषि भूमि पर भवन निर्माण के बाद भी राजस्व अभिलेखों में वह जमीन खेती वाली ही दर्ज है, जब तक कि उसे धारा 143 के तहत गैर कृषि (अकृषि) भूमि में न बदल दिया जाए। इसलिए लोगों को अपनी भूमि का वर्तमान भू उपयोग राजस्व अभिलेखों में भी दर्ज करवा लेना चाहिए।
-हिमांशु कफल्टिया, एसडीएम, टनकपुर।
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