डा.नीरज गोस्वामी, डा.सुशील सिंह, डा.बीएल जायसवाल, डा.विनोद कुमार, डा.इरशाद अहमद, डा.अंजुम आर्या, डा.विपिन कुमार, डा.नरेंद्र सिंह, डा.एसके वर्मा, डा.सिद्धराज चौहान, डा.बानीफेस, डा.विनय कुमार, डा.सुहागिनी मुरमुल, डा.एनएस मेहरा, डा.मुकेश परमाल, डा.महापात्रा, डा.रोहित, डा.कमलकांत मित्रा, डा.कुनाल गर्ग, डा.एसपी सिंह, डा.शमसाद और डा.अजीत सिंह। ये वे 22 डॉक्टर हैं, जिन्होंने 25 अक्तूबर 2013 में खुले जिले के पहले पीपीपी अस्पताल से अब तक इस्तीफा दिया है। ये डॉक्टर नौकरी छोड़ क्यों जा रहे हैं? यह पहेली अब भी अनसुलझी है, मगर इसकी मार जरूर अस्पताल की व्यवस्थाओं पर पड़ रही है। बेहतर इलाज को तरस रहे लोहाघाट के इस अस्पताल में डॉक्टरों के न टिक पाने की बीमारी का इलाज जरूरी है।
लोहाघाट के सरकारी अस्पताल को बेहतर इलाज की उम्मीद में पब्लिक-प्राइवेट पाटनरशिप (पीपीपी) मोड में दिया गया। बरेली के शील अस्पताल द्वारा इसका संचालन किया जा रहा है, लेकिन अच्छे इलाज से ज्यादा यह अस्पताल विवादों और आंदोलनों के चलते सुर्खियों में रहा। बार-बार डॉक्टर क्यों अस्पताल को छोड़ रहे, इसका समाधान भी अस्पताल प्रबंधन नहीं खोज सका है। डॉक्टरों के लंबे समय तक नहीं रुकने से अस्पताल की व्यवस्था चरमराने के साथ ही मरीजों के इलाज पर भी असर पड़ता रहा है।
इस वक्त भी सृजित 12 पदों में से 10 डॉक्टर ही यहां तैनात है। रेडियोलॉजिस्ट और निश्चेतक की कुर्सी खाली होने से न तो यहां अल्ट्रासाउंड हो पा रहे हैं और नहीं ऑपरेशन। अस्पताल में यदा-कदा गर्भवती महिलाओं के अल्ट्रासाउंड जरूर होते हैं। पैथोलॉजी जांचों की स्थिति ठीकठाक है। प्रबंधक संजय सैनी का कहना है कि अक्तूबर 2013 से अब तक 115445 ओपीडी मरीजों का इलाज किया जा चुका है।
डॉक्टरों के अस्पताल छोड़ने के लिए वेतन वजह नहीं है। असहजता, असुरक्षा के अलावा कई बार मरीजों के तीमारदारों द्वारा किए गए दुर्व्यवहार से डॉक्टरों में डर पनपा, जिससे डॉक्टर अस्पताल छोड़ते रहे। डॉक्टरों द्वारा अस्पताल से जाने की स्थिति में अब सुधार हुआ है। डॉक्टरों के स्थायित्व के लिए प्रबंधन द्वारा उठाए गए कई प्रभावी उपायों से हालात बेहतर हुए हैं। -संजय सैनी, प्रबंधक, शील पीपीपी अस्पताल, लोहाघाट।