लोहाघाट (चंपावत)। भैया दूज के मौके पर नेपाल सीमा से लगे मडलक गांव में मां भगवती की भव्य डोला रथ यात्राएं निकलीं। इनमें हजारों लोगों ने शामिल होकर मां का आशीर्वाद लिया। इस दौरान बगोटी, मजपीपल, मडलक और देवीमैत से मां भगवती की डोला यात्राएं निकलीं।
भैयादूज पर मडलक क्षेत्र के 12 गांवों के लोग वैष्णवी देवी मंदिर में मां का आशीर्वाद लेते हैं। बगोटी गांव में शुक्रवार रात देवी जागरण हुआ। इस दौरान लोक देवताओं ने अवतरित होकर लोगों के कष्टों का निवारण किया। बगोटी के डोले में खीमा देवी, मजपीपल के डोले में खीम सिंह, मडलक के डोले में शीषपाल सिंह, देवीमैत के डोले में चंचला देवी विराजमान होकर श्रद्धालुओं को आशीर्वाद दिया।
सागर सेल्ला के ग्रामीणों ने मायके वालों की भूमिका निभाते हुए परंपरागत रूप से मां भगवती का स्वागत किया। दुर्गम रास्तों को पार कर डोला यात्राओं ने देवी मैत और मुख्य मंदिर की परिक्रमा की।
ऐसी मान्यता है कि भैयादूज के दिन मां वैष्णवी अपने मायके देवीमैत में भाइयों का पूजन करने आती हैं। रथ यात्राओं के पीछे बड़ी संख्या में महिलाएं मां के जयकारे लगाते चल रहीं थीं। मेले में शांति व्यवस्था बनाने के लिए पुलिस तैनात रही। इस मौके पर मंदिर समिति के अध्यक्ष पवन जोशी, सचिव शंकर दत्त पांडेय, ग्राम प्रधान भुवन भट्ट, डॉ. सतीश पांडेय, बद्री सिंह सौन, संतोक सिंह रावत, दीनानाथ पांडेय, विक्रम सिंह सामंत, यशोधर पांडेय आदि रहे।
भक्तों ने लिया मां नैनावती का आशीर्वाद
पिथौरागढ़। जिला मुख्यालय के नैनीसैनी क्षेत्र में नैनीचौरा के प्रसिद्ध मेले का आयोजन किया गया। इसमें आस्था के साथ मां नैनावती देवी का डोला निकाला गया।
शनिवार को भैया दूज पर नैनी में नैनावती देवी मंदिर में मेला शुरू हुआ। कालछिन मंदिर में देव डांगर ललित सिंह ने अवतरित हुए। मां नैनावती का डोला ढोल-नगाड़ों के साथ उठा। इसमें भरत सिंह ने अवतरित होकर आशीष दिया। मां नैनावती के जयकारों के साथ डोले को मंदिर में लाया गया। इस दौरान मंदिर में मां के जयकारों से पूरा क्षेत्र गुंजायमान हो उठा। श्रद्धालुओं ने मां नैनावती देवी सहित देव डांगरों का आशीष लिया।
मेले में आसपास के क्षेत्र से बड़ी संख्या में लोग पहुंचे हैं। पुजारी तुलसी दत्त भट्ट ने सभी अनुष्ठान कराए। प्रधान सुंदर प्रसाद और सामाजिक कार्यकर्ता विक्रम सिंह महर ने बताया कि प्रत्येक वर्ष भैया दूज पर होने वाले इस मेले से क्षेत्र के लोगों की गहरी आस्था जुड़ी है। इस दौरान खाने-पीने की दुकानों के साथ ही कपड़ों की अस्थायी दुकानें भी लगीं।