सतीश जोशी ‘सत्तू’
चंपावत। उत्तराखंड राज्य में पांचवें विधानसभा चुनाव की रणभेरी बजने के बाद विभिन्न राजनीतिक दलों की ओर से मतदाताओं को अपनी ओर रिझाने के लिए कई लोक लुभावने वायदों का घोषणा पत्र तैयार तो किया जा रहा है लेकिन इस बार के विधानसभा चुनाव में कोविड नियंत्रण के लिए चुनाव आयोग की सख्ती के बाद प्रत्याशियों का घोषणापत्र जनता तक पहुंचाना मुश्किल हो सकता है।
ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या पिछले चुनावों में राजनीतिक दलों और प्रत्याशियों की ओर से दिए गए वायदों और घोषणापत्र की हकीकत धरातल पर कितनी उतरी। घोषणापत्र की कितनी घोषणाओं को पांच साल के कार्यकाल में अमलीजामा पहनाया जा सका और कितनी घोषणाओं में रत्ती भर भी काम नहीं हुआ। चुनाव में राजनीतिक दलों की ओर से जारी घोषणा पत्र का कार्यकाल समाप्त होने पर कोई परीक्षण नहीं किया जाता है। इससे मतदाताओं की ओर से राजनीतिक दलों के घोषणा पत्र पर सवाल उठाए जाते रहे हैं।
हर मतदाता तक पहुंचे राजनीतिक दलों का घोषणा पत्र
चंपावत। सामाजिक चिंतक और इतिहासकार देवेंद्र ओली का कहना है कि हर मतदाता तक राजनीतिक दलों का घोषणापत्र पहुंचाने की व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिए। सत्ता तक पहुंच चुके राजनीतिक दलों के नए घोषणापत्र के साथ ही पुराने घोषणापत्रों की हकीकत का परीक्षण भी किया जाना चाहिए। ताकि मतदाताओं के समक्ष असलियत उजागर हो सके।
भुलावे के स्थान पर सोच समझ कर करें मतदान
चंपावत। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी उत्तराधिकारी कल्याण परिषद के अध्यक्ष महेश चौड़ाकोटी के अनुसार राजनीतिक दलों का घोषणापत्र केवल दिखावा होता है। सत्ता मिलने पर सभी दल अपनी मनमानी में आते हैं। ऐसे में मतदाताओं को घोषणापत्र के भुलावे में नहीं आना चाहिए और सोच, समझ कर मतदान करना चाहिए।