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संस्कृत दिवस पर:कम हो रहे देववाणी को पढ़ने वाले

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चंपावत का संस्कृत विद्यालय। - फोटो : CHAMPAWAT
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देववाणी संस्कृत तमाम भाषाओं की जननी मानी जाती है लेकिन इस भाषा के प्रोत्साहन के लिए जमीनी स्तर पर काम नहीं हो रहा है। यहां तक कि संस्कृत स्कूलों को लेकर सरकार ने भी मुंह मोड़ लिया है। जिला मुख्यालय चंपावत के संस्कृत विद्यालय की स्थिति दयनीय है। स्टाफ और संसाधनों की कमी से यहां पढ़ने वाले लगातार कम हो रहे हैं।
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श्रीरामचरित मानस, श्रीमद्भागवत गीता सहित भारत के कई बड़े धर्मग्रंथ संस्कृत भाषा में है। इसी के चलते संस्कृत को देववाणी माना जाता है। उत्तराखंड सरकार ने भी इसी कारण इसे प्रदेश की दूसरी राज्य भाषा का दर्जा दिया लेकिन फिर भी संस्कृत भाषा और संस्कृत विद्यालयों की हालत नहीं सुधरी। आजादी से पूर्व के चंपावत के कूर्मांचल संस्कृत विद्यालय की तस्वीर लगातार खराब होती गई।
सात कक्षाओं को पढ़ाने के लिए एक स्थायी और तीन संविदा शिक्षक हैं। प्रधानाचार्य का पद भी पूर्णकालिक नहीं है। स्टाफ और दूसरे संसाधनों की कमी से विद्यालय में अब महज 14 छात्र रह गए हैं। जबकि 2014 में यहां 65 छात्र पढ़ते थे। गरीब और ग्रामीण पृष्ठभूमि के इन छात्रों के लिए बैठने के लिए पर्याप्त फर्नीचर भी नहीं है। इन परिस्थितियों के बीच संस्कृत को जन-जन की भाषा बनाना टेड़ी खीर होगा।
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संस्कृत विद्यालय में स्टाफ की कमी है। अभी एक स्थायी और तीन संविदा शिक्षक हैं। कम छात्र संख्या के चलते शिक्षकों की तैनाती नहीं हो पा रही है। स्टाफ की कमी के बावजूद शिक्षक अपनी ओर से अधिकतम योगदान कर रहे हैं। उमापति जोशी, प्रभारी प्रधानाचार्य।
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कक्षा छात्र संख्या
6 1
7 4
8 1
9 1
10 2
11 3
12 2
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