भारत-नेपाल सीमा को बांटने वाली काली नदी के किनारे बसा चूका गांव बेहद खूबसूरत है। यहां पहाड़ी जिले का मैदान सा समतल इलाका है। फसल के लिए भी यहां की जमीन काफी उपयुक्त है, लेकिन यहां न समृद्धि है और न विकास की किरण। इसकी वजह यहां रोड न होने के अलावा बिजली की रोशनी का न होना है। रात का अंधेरा यहां के विकास की संभावना को निगल रहा है।
मां पूर्णागिरि के बेस कैंप ठुलीगाड़ से करीब 26 किमी दूर स्थित चूका गांव आजाद भारत के 68 साल बाद भी बिजली के उजाले का इंतजार कर रहा है। ऊर्जा प्रदेश के चूका गांव में अब तक बिजली नहीं है। ये हाल तब है, जब यहां राजीव गांधी विद्युतीकरण मिशन के तहत लाखों रुपये खर्च कर पोल, ट्रांसफार्मर आदि सब लगे ह्रैं, लेकिन विभाग की अनदेखी से यहां लोगों की रात अंधेरे में कट रही है। ग्रामीण राम सिंह, राजेंद्र सिंह, बची राम आदि कहते हैं कि बिजली नहीं होने से विकास की यात्रा चूका में ठहर गई है। यहां से अन्यत्र बसने वालों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है। नेपाल सीमा से लगे चूका में एसएसबी की बॉर्डर आउटपोस्ट में भी सोलर सिस्टम लगाया गया है, लेकिन ऐसा कोई सिस्टम गांव के लोगों के लिए नहीं है।
बस रेडियो है चूका के लोगों का सहारा
बिजली नहीं होने से यहां के लोगों का विकास ही नहीं देश-दुनिया से संपर्क भी कट रहा है। मोबाइल चार्जिंग की व्यवस्था नहीं होने से अधिकांश लोग मोबाइल फोनों से भी वंचित है। टेलीविजन का यहां कोई मतलब नहीं। बस जानकारी का एकमात्र साधन रेडियो है।
ग्रामीण नेत्रबल्लभ तिवारी का कहना है कि चूका और आसपास के इलाकों मेें बिजली नहीं होने से लोग अब भी 19वीं सदी का जीवन जी रहे हैं। बिजली और रोड विकास की बुनियाद हैं, लेकिन इन दोनों का ही यहां अभाव है।
तल्लादेश के गांवों से लेकर चूका तक वर्षों पूर्व राजीव गांधी विद्युतीकरण मिशन के तहत बिजली की लाइनें बनाई गई थीं, लेकिन आपदा ने इन लाइनों, पोलों को ध्वस्त कर दिया। यहां की भौगोलिक हालात विद्युतीकरण के लिए उपयुक्त नहीं है। इसके विकल्प के तौर पर सौर ऊर्जा से इलाके को रोशन करने का सुझाव दिया गया है। -आरसी पंत, जेई, चंपावत।