जिले में कई जगहों पर गैस गोदामों बने होने के बावजूद ग्रामीण उपभोक्ता गैस सिलेंडर के लिए 300 से 400 रुपये तक भाड़ा देने को मजबूर हैं। पूरा दिन खराब होता है, सो अलग। स्थिति यह है कि इन गैस गोदामों का कभी उपयोग न हो पाने से ग्राहकों को हर महीने मोटी रकम का चूना लग रहा है। अब जर्जर हाल हो चुके ये गोदाम बदहाल स्थिति में हैं।
दूरदराज ग्रामीण क्षेत्रों में ईंधन सुविधा गांव के नजदीक मुहैय्या कराने के मकसद से श्यामलाताल, तामली, मौनपोखरी, रौसाल में गैस गोदामों का निर्माण किया गया था। करीब 15 वर्ष पूर्व निर्मित इन भवनों के निर्माण में कुल 10 लाख रुपये खर्च हुए लेकिन इन गोदामों का उपयोग कभी भी नहीं हो सका। श्यामलाताल सहित इन गोदामों में झाड़-झंखाड़ उग आए हैं।
गोदामों के काम नहीं करने से दूरस्थ क्षेत्र के लोगों को गैस सिलेंडर लाने-ले जाने में भारी परेशानी उठानी पड़ रही है। 61 किमी दूर श्यामलाताल और आसपास के गांवों के लोगों को चंपावत गैस केंद्र से सिलेंडर लेना पड़ता है, जिस पर 150 रुपये भाड़े, 200 रुपये यात्री किराया और 50 रुपये चाय-खाने के रूप में (कुल 400 रुपये) खर्च करने पड़ते हैं। 53 किमी दूर तामली सहित तल्लादेश के लोगों को सिलेंडर के लिए चंपावत आने में 300 रुपये अतिरिक्त देने पड़ते हैं। श्रीरीठा साहिब सहित लधिया घाटी के कई लोग गैस सिलेंडर के लिए 62 किमी दूर लोहाघाट केंद्र में दौड़ लगाते हैं, जिसमें भाड़े के रूप में 350 रुपये तक खर्च करने पड़ रहे हैं।
इधर, जिले के गैस वितरण केंद्रों का कहना है कि दूरदराज के लोगों की सुविधा के लिए वाहनों के जरिए गैस सिलेंडर पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है। मगर ग्रामीण गिरीश भट्ट, भवान सिंह परवाल, महेश चंद्र सहित तमाम लोग इन दावों को खारिज करते हैं।
जिले के ये गैस गोदाम कैसे बने, इसकी जानकारी नहीं, मगर ये गोदाम मानकों पर खरे नहीं उतरते हैं। इस वजह से इनको हरी झंडी नहीं मिली। वैसे किसी भी गैस गोदामों के संचालन के लिए इंडियन ऑयल कंपनी के मानकों का पूरा किया जाना जरूरी है। मानक पूरा होने पर ही आईओसी की अनुमति मिलती है।
-टीएस मर्तोलिया, महाप्रबंधक, केएमवीएन (गैस)।