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काश्तकारों को लुभा नहीं रही आलू की खेती

Sun, 11 Jun 2017 10:26 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो चंपावत
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सफेद हाथी बना कोल्ड स्टोर - फोटो : अमर उजाला
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ध्यानार्थ ..................

आलू की खेती के लिए चंपावत खूब मशहूर रहा है। पर खूबियों से भरपूर यहां के आलू पर अब ग्रहण लग रहा है। इसकी खेती सिकुड़ रही है। बुवाई भी कम हो रही है और उत्पादन में भी तेजी से गिरावट हो रही है। एक दशक में आलू की खेती करीब 50 प्रतिशत रह गई। वहीं पैदावार में भी भारी गिरावट हो गई है।

चंपावत का आलू स्वाद ही नहीं सेहमंद भी है। पूरी तरह जैविक आलू की उप्र से लेकर उत्तराखंड के कई हिस्सों में मांग भी है। मगर यहां आलू की पैदावार नहीं बढ़ रही है। चंपावत के आसपास के गांव राकड़ी फुलारा, चैकुनीबोरा, बाजरीकोट, मुड़ियानी, नरियाल गांव के अलावा लोहाघाट व खेतीखान आदि क्षेत्रों में आलू की खूब पैदावार होती थी। लेकिन अब यहां के अधिकांश इलाकों में आलू की खेती के प्रति किसानों का उत्साह नहीं रह गया है। इसकी वजह मंडी या अच्छा दाम न मिलना नहीं है, बल्कि सूअरों द्वारा आलू की फसल को बर्बाद करना है।
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बीते एक दशक में आलू की खेती घटकर आधी रह गई है। 2007 में आलू की बुवाई 2161 हेक्टेयर में थी। जो दस साल बाद 49.04 प्रतिशत कम होकर 1100 हेक्टेयर तक पहुंच गई है। पैदावार कम हुई, तो उत्पादन में भी गिरावट आई। 2007 में 36075 मीट्रिक टन आलू हुआ। जो पिछले साल कम होकर 11670 तक आ पहुंचा। जिले में वर्ष 2010 से 2016 तक के आलू की बुआई के क्षेत्रफल और उत्पादन पर निगाह डाले तो इस दौरान 2015 को छोड़कर हर साल इसकी बुआई का एरिया और उत्पादन घटा है। जिला उद्यान अधिकारी एनके आर्या कहते हैं कि सूअर सहित अन्य जंगली जानवर आलू की खेती के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। फसल बर्बाद होने के अंदेशे से किसान अधूरे मन से आलू की बुवाई करता है।

वर्ष         बुवाई का एरिया (हेक्टेयर में)          पैदावार (मीट्रिक टन में) 
2010              2500                           42500
2011              2441                           37905
2012              2401                           35407
2013              2390                           33750
2014              1975                           29600
2015              2515                           42757
2016              1100                           11670 

 नुकसान से कम कर दी बुवाई
तिलौन गांव के आलू उत्पादक सुरेश सिंह का कहना है कि पहले वे 10 कुंतल आलू बीज की बुवाई करते थे। पैदावार भी 40 कुंतल तक हो जाती थी। लेकिन बीते छह वर्षों से एक-तिहाई बुवाई कर रहे हैं। सूअर आलू की खेती के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द है।


बचाव के उपाय खोजना जरूरी 
मांदली के त्रिलोक सिंह कहते हैं कि जंगली जानवरों से बचाव का उपाय खोजे बगैर आलू की खेती को नहीं बढ़ाया जा सकता है। किसान कर्ज लेकर आलू की बुवाई करता है और सूअर उनकी मेहनत पर पानी फेर रहे हैं।


घाटे का सौदा रह गई आलू की खेती
फुलारागांव के विद्याधर फुलारा का कहना है कि आलू की खेती अब घाटे का सौदा रह गई है। इसमें लागत भी नहीं मिल रहा है। खेत खाली छोड़ने के बजाय आलू की खेती तो करते हैं, पर नुकसान हो रहा है।

मेहनत ज्यादा मुनाफा कम
मुड़ियानी के देवेंद्र सिंह का कहना है कि आलू की खेती में मेहनत ज्यादा और मुनाफा कम है। सहकारी समितियों से कर्ज लेकर खेती करते हैं और उत्पादन बढ़ने के बजाय कम हो रहा है।
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कोल्ड स्टोर भी शुरू नहीं हो सका
चंपावत। आलू की प्रचुर खेती के मद्देनजर उत्तर प्रदेश के दौर में 1995 में चंपावत से करीब सात किलोमीटर दूर मुड़ियानी में कोल्ड स्टोर बनाया गया था। इसमें 77 लाख रुपये से अधिक खर्च भी हुए। मगर 2000 मीट्रिक टन क्षमता का यह कोल्ड स्टोर कभी शुरू नहीं हो सका। भवन का संयंत्र नहीं बनने से कोल्ड स्टोर उपयोग में नहीं लाया जा सका। 19 नाली 7 मुट्ठी जमीन पर बना छह मंजिला कोल्ड स्टोर भवन में न तापमान को ठंडा करने के लिए रेफरिजरेशन लगा और नहीं वुडन वर्क हो सका।  
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