काली कुमाऊं की वीर प्रसूता धरती में यहां की माताओं ने ऐसे जांबाजों को जन्म दिया है, जिन्होंने देश की रक्षा के लिए अपनी वीरता, पराक्रम का इतिहास लिखा है। नेपाल सीमा से जुड़े निडिल गांव के वीरचक्र प्राप्त कै.कर्म सिंह सामंत ने 1947-48 में भारत-पाक युद्ध के दौरान बारामूला सेक्टर में अपनी जान जोखिम में डालकर दुश्मन के महत्वपूर्ण ठिकानों में हमला किया और दुश्मन के 90 सैनिकों को घायल कर अपनी टुकड़ी को बचाने में कामयाबी हासिल की।
चमदेवल जाख जिंडी के अमर शहीद नायक पूरन चंद तीन पैराशूट कुमाऊं रेजीमेंट में भर्ती हुए थे। 1997 में इस रेजीमेंट को गाजा पट्टी में तैनात किया गया था। यहां पूरन चंद अपनी टुकड़ी को बचाने के लिए बारूदी सुरंग में शहीद हो गए थे, जिन्हें अशोक चक्र से सम्मानित किया गया। जनकांडे के कै.उमेद सिंह माहरा ने 1971 में नागालैंड में अपनी टुकड़ी से अधिक नागा दुश्मनों के काफिले में हमला करने के दौरान स्वयं शहीद हो गए, जिन्हें मरणोपरांत अशोक चक्र दिया गया। वन पैरा बटालियन के सिपाही राम सिंह को भी उनकी वीरता जांबाजी के लिए अशोक चक्र से सम्मानित किया गया। पाटन के सूबेदार मेजर कल्याण सिंह ने पंजाब में आतंकवादी कार्रवाई के दौरान 1984 में आतंकवादियों को मुंहतोड़ जवाब देने पर उन्हें शौर्य चक्र से सम्मानित किया।
तोपखाना रेजीमेंट के मोहन सिंह को शौर्यचक्र मिला था। रौंतली माहरा के सिपाही बलवीर सिंह को नागा विद्रोहियों से मुकाबला करने पर शौर्य चक्र, तड़ाग के रमेश सिंह को ऑपरेशन मेघदूत में अदम्य साहस का परिचय देने के लिए मरणोपरांत कीर्ति चक्र, नेवलटुकरा के मोहन सिंह धौनी को चीनी आक्रमण के दौरान वीरता दिखाने के लिए शौर्य चक्र से सम्मानित किया गया।
अंग्रेजों ने भी किया था काली कुमाऊं के वीरों का सम्मान
काली कुमाऊं की धरती के वीरों का अंग्रेजों ने भी सम्मान किया था। नगर के हॉस्पिटल कालोनी निवासी स्व.कै.मोहन सिंह बोहरा कुमाऊं क्षेत्र के पहले व्यक्ति थे, जिन्हें उनके शौर्य और पराक्रम के लिए ओबीआई जैसे सम्मान से नवाजा गया था। खतेड़ा गांव के मूल निवासी मोहन बोहरा ने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान हांगकांग में जापान और जर्मनी के बीच हुए युद्ध में भारतीय सेना की टुकड़ी का नेतृत्व किया। उससे प्रभावित होकर उन्हें सिकत्तर और जमींदार की पदवी भी दी गई। यह ब्रिटिश शासनकाल में सबसे बड़ा सम्मान माना जाता था। यही नहीं कै.बोहरा की इस जांबाजी पर उन्हें ब्रिटिश सरकार ने अल्मोड़ा जिले के अयारतोली मल्लाकत्यूर दानपुर में 100 नाली भूमि भी इनाम स्वरूप दी थी तथा डिप्टी कमिश्नर अल्मोड़ा के हस्ताक्षरों से उन्हें भूमि का पट्टा दिया गया था। देश की आजादी के बाद कै.बोहरा जनरल करिअप्पा को कुमाऊं के दौरे में लाए थे।