उत्तराखंड संस्कृत अकादमी के सदस्य डॉ. कमलेश सक्टा।
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चंपावत। प्रदेश की दूसरी राजभाषा संस्कृत अभी आम लोगों में खास चलन में न हो, लेकिन जल्द ही हर जिले में यह भाषा लोकप्रिय होने जा रही है। इसे जनवाणी बनाने के लिए उत्तराखंड संस्कृत अकादमी हर जिले में एक-एक गांव को संस्कृत गांव के रूप में पहचान दिलाएगी। इसके जरिये संस्कृत भाषा को लोगों के लिखने, बोलने और व्यवहार में उपयोग लाने का प्रयास किया जाएगा। चंपावत जिले में खर्ककार्की गांव को संस्कृत गांव बनाया जाएगा।
जिले में देवीधुरा और चंपावत में संस्कृत महाविद्यालय हैं। बावजूद इसके इस भाषा को जानने वाले मुट्ठीभर लोग हैं, लेकिन अब इस स्थिति में बदलाव आ सकता है। उत्तराखंड संस्कृत अकादमी की ओर से प्रदेश के सभी 13 जिलों से एक-एक गांव को संस्कृत गांव बनाया जा रहा है। हर स्कूल में मुख्य प्रशिक्षक और एक सहायक प्रशिक्षक तैनात किया जाएगा। संस्कृत संभाषण में दक्ष और पढ़ाना-लिखाना जानने वालों को इसमें शामिल किया जाएगा। गांवों में भेजे जाने से पहले इन प्रशिक्षकों को 15 दिन का प्रशिक्षण दिया जाएगा। गांव के किसी स्कूल या सामुदायिक भवन में हर आयु वर्ग के लोगों को पढ़ाई कराई जाएगी।
प्रदेश के जिलों के चयनित संस्कृत गांव
चंपावत में खर्ककार्की, पिथौरागढ़ में उर्ग, अल्मोड़ा में जागेश्वर, ऊधमसिंह नगर में गूलरभोज, नैनीताल में पतलोट, देहरादून में मालदेवता, पौड़ी में फलस्वाड़ी, टिहरी में सांवली, रुद्रप्रयाग में डांगी बांगर, चमोली में रतूड़ा, उत्तरकाशी में मुखवा और हरिद्वार में मुंडयाकी गांव। बागेश्वर जिले में अभी गांव का नाम तय नहीं।
कोट
प्रदेश के हर गांव में संस्कृत गांव खोले जाने से देववाणी संस्कृत जन-जन की भाषा बनेगी। इससे संस्कृत आम लोकाचार में शामिल होगी। प्रदेश के सभी संस्कृत गांवों में गांव के स्थानीय संस्कृत के जानकारों की भी मदद ली जाएगी।- डॉ. कमलेश सक्टा, सदस्य राज्य संस्कृत अकादमी।