इस वर्ष सड़क दुर्घटनाओं पर लगाम नहीं लग पा रही है। अभी साल के नौ माह भी नहीं बीते, कि 46 हादसों में 18 लोगों की मौत हो चुकी है। हादसों का ये आंकड़ा सात वर्षों में सबसे ज्यादा है। इससे पूर्व 2012 में 29 हादसों में 18 की मौत और 86 घायल हुए थे। प्रशासन और परिवहन विभाग इन हादसों पर अंकुश नहीं लगा सका।
रविवार रात मटियानी के पास हुए सड़क दुर्घटना में सशस्त्र सीमा बल (एसएसबी) के दो कर्मियों सहित कुल तीन लोगों की मौत हो गई। इसे मिलाकर तीन सितंबर 2017 तक चंपावत जिले में छोटे-बड़े 46 हादसे हो चुके हैं। इन दुर्घटनाओं में 18 लोगों की मौत हो चुकी है। 44 लोग घायल हो गए। इन दुर्घटनाओं में नौ हादसों में चार कर्मियों की मौत और आठ कर्मी घायल हुए हैं। पुलिस, प्रशासन, परिवहन विभाग भी हादसों पर लगाम लगाने में कामयाब नहीं रहा है। दुर्घटनाओं के बाद कुछ वक्त तक चेकिंग होती है, लेकिन समय बीतने के बाद इन कवायदों पर ब्रेक लग जाता है और अगली दुर्घटना होने के बाद फिर से इसे दुहराया जाता है।
इस वर्ष सड़क दुर्घटनाओं पर लगाम नहीं लग पा रही है।
चंपावत। ग्रामीण क्षेत्रों में यातायात नियमों की धड़ल्ले से धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। इन मार्गों में वाहन चालक सवारियों को ठूंस ठूंस कर ढो रहे हैं, जिन पर किसी का बस नहीं चलता। जबकि रात में भी बेरोकटोक वाहनों की आवाजाही जारी रहती है। रात को दुर्घटनाओं से बचने के लिए जहां टनकपुर-पिथौरागढ़ राष्ट्रीय राजमार्ग में जहां चल्थी, ककरालीगेट, घाट में रात को आठ बजे बाद वाहनों का आवागमन प्रतिबंधित किया गया है, वहीं पुलिस प्रशासन द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में रात के समय वाहनों के आवाजाही रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठाए गए हैं। इन ग्रामीण मार्गों में सीमित संख्या में ही वाहनों का संचालन होने से ग्रामीण लोग वाहनों में ठूंस-ठूंस कर जाने के लिए मजबूर होते हैं। इसका फायदा उठाते हुए ग्रामीण क्षेत्रों में चलने वाले वाहन चालक यातायात नियमों को धता बताते हुए धड़ल्ले से वाहनों का संचालन कर रहे हैं, जिन पर रोक लगाने में परिवहन, पुलिस, प्रशासन नाकाम साबित हुआ है। वहीं रात को भी वाहन चालक बेरोकटोक वाहनों का संचालन करते हैं, जिससे रात के समय दुर्घटनाओं का अधिक खतरा रहता है।
मौत के वाहन को खुद दिया जवानों ने हाथ
चंपावत। रात्रि में सीमा क्षेत्र की सुरक्षा में तैनात एसएसबी के जवानों ने खुद ही मौत के वाहन को हाथ देकर रोका था। एसएसबी की पंचम वाहिनी के सहायक कमांडेंट दामोदर मीणा के अनुसार मृत और घायल जवान सीमा क्षेत्र की पेट्रोलिंग पर थे। रात में बीओपी लौटने के दौरान जवानों को मैक्स वाहन आता दिखा तो उन्होंने जल्दी पहुंचने के लिए वाहन को रुकवाया और उसमें बैठ गए। जो कुछ दूर चलने के बाद अनियंत्रित होकर खाई में जा गिरा।
रोशनी की पुख्ता व्यवस्था न होने से बचाव कार्य में दिक्कतें
नेपाल सीमा से लगे मटियानी गांव के पास घटगाड़ में मैक्स दुर्घटना ग्रस्त होने के बाद राहत और बचाव कार्य में पुलिस, एसएसबी और स्थानीय लोगों को काफी मशक्कत करनी पड़ी। रोशनी की पुख्ता व्यवस्था न होने से बचाव कार्य में काफी दिक्कतें झेलनी पड़ी। घटना की सूचना मिलने पर पंचेश्वर कोतवाली से पुलिस टीम, एसएसबी, ग्रामीण आनन फानन में मौके की ओर रवाना हो गई। घटना स्थल में पहुंचने के बाद रोशनी करने की कोई पुख्ता इंतजाम नहीं थे। घायलों को खाई से निकालने के लिए लोग और सुरक्षा कर्मी छोटी टॉर्चों के सहारे करीब 300 मीटर गहरी खाई में दुर्घटनाग्रस्त वाहन के पास पहुंचे। जिन्हें कंटीली झाड़ियों, खस्ताहाल रास्तों के चलते भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। रात में रोशनी की कमी होने के कारण कई बार लोग चोटिल होने से भी बचे। लोगों का कहना है कि रात को घटना के वक्त घायलों को खाई से निकालने के लिए न कोई आपदा प्रबंधन की टीम पहुंची हुई थी और न ही प्रशासनिक, पुलिस अधिकारी ही पहुंचे। बचाव कार्य में लगे लोगों ने जान जोखिम में खाई से घायलों को निकाला। इसमें कई लोगों के जूते चप्पल भी झाड़ियों में फंसने से गिर गए थे। एसएसबी के अधिकारी, जवान पहुंचे हुए थे। पुलिस कर्मियों, ग्रामीणों, एसएसबी के जवानों ने कड़ी मशक्कत के बाद रात के अंधेरे में घायलों, मृतकों को गहरी खाई से निकालकर सड़क तक पहुंचाया गया। जहां से 108 आपात सेवा के जरिए दो घायलों को 35 किमी दूर लोहाघाट के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में लाया गया। पंचेश्वर के कोतवाल डीएल वर्मा के नेतृत्व में पुलिस कर्मियों, एसएसबी के जवानों के अलावा ग्रामीण महेश भट्ट, रमेश भट्ट, प्रताप सिंह बोहरा, दीपक भट्ट, सुंदर सिंह सामंत, मनोहर सामंत ने राहत कार्य में जुटे रहे। ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि घटना की सूचना देन के बाद भी 108 आपात सवा तीन घंटे बाद आधे रास्ते में मिली। घायलों को निजी वाहनों से लाकर किमतोली के पास 108 में शिफ्ट किया गया।