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खुद की आंखें चली गईं, लेकिन रोशन कर रहे दूसरे की जिंदगी

Mon, 04 Apr 2016 02:35 PM IST
भूपेश कन्नौजिया/ अमर उजाला, मुक्तेश्वर (नैनीताल)
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गिरीश
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इरादे बुलंद हों तो राहें अपने आप आसान हो जाती हैं। ऐसा ही कुछ कर दिखाया है एक जिंदादिल इंसान ने। जिसने आंखों की रोशनी न होते हुए भी समाज को नई राह दिखाने का काम किया है। किसी ने सही कहा है की जहां चाह वहां राह।
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नैनीताल जिले में ओखलकांडा ब्लॉक के खुटियाखाल निवासी गिरीश थुवाल (उम्र-35) दृष्टिहीन होते हुए भी आज के नौजवानों के लिए प्रेरणास्रोत हैं। क्षेत्र में पिछले 10 साल से समाज सेवा से अपनी विशिष्ट पहचान बना चुके थुवाल को हर कोई प्यार से ‘दादा’ कह कर पुकारता है।

गिरीश बचपन से ही रतौंधी से पीड़ित थे। कई जगह इलाज करवाया पर कोई सफलता नहीं मिली और धीरे-धीरे कुदरत ने दोनों आंखों की रोशनी छीन ली। नवीं कक्षा हेल्पर की मदद से उत्तीर्ण की। पिता मोहन थुवाल और माता हीरा थुवाल ने कभी गिरीश का साथ नहीं छोड़ा। उसे हमेशा हर संभव मदद की।
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गिरीश ने कुछ अलग करने की ठानी और तय कर लिया कि कुछ अलग कर समाज में अपनी पहचान बनाएगा और समाज सेवा का बीड़ा उठाया। बेरोजगार युवाओं को रोजगार, स्व रोजगार के लिए प्रेरित किया, विधवा पेंशन, वृद्धावस्था पेंशन के लिए दफ्तरों के स्वयं चक्कर काट लोगों के कार्य पूर्ण कराए।
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सामाजिक कार्य
गिरीश ने करीब पांच दर्जन लोगों को रामगढ़, धारी और ओखलकांडा में रोजगार दिलाया। करीब 20 लोगों की पेंशन लगवाई और एक दर्जन से अधिक जलस्रोतों को संरक्षित करने का काम किया। 

गिरीश विकलांग विकास योजना और अश्व कल्याण समिति के अध्यक्ष हैं और क्षेत्र में विकलांगों और घोड़ा-खच्चर पालकों के लिए कार्य कर रहे हैं। लंदन की संस्था ब्रूके हॉस्पिटल फॉर एनिमल्स के साथ हाथ मिला कर गिरीश काफी खुश हैं।

अपने एनजीओ के जरिए वह चाहते हैं कि उन लोगों की मदद करें, जो राज्य और केंद्र सरकार से उपेक्षित हैं। गिरीश अब तक 124 अश्व कल्याण समूहों का गठन कर चुके हैं।

गिरीश ने घोड़ों को खिलाये जाने वाले बाजार में उपलब्ध महंगे दाने के बदले अपने स्वयं सहायता समूह के माध्यम से नायाब तरीका निकाला है। वह बताते हैं कि उनके स्वयं सहायता से जुड़े स्वयंसेवी गांवों से उन खाद्यानों को एकत्र करते हैं जो
आदमी के खाने लायक नहीं होता।

जौ, गेहूं, मक्का, चना, बाजरा आदि खरीद कर अपने स्वयं निर्मित प्लांट में लाते हैं और उसे तैयार कर घोड़ा पालकों को बेच देते हैं। पैकिंग, मार्केटिंग के खर्चे निकालने के बाद समूहों को प्रति माह 10 से 20 हजार तक आय हो जाती है।
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