बागेश्वर जिले में दो दशकों से सड़क की बाट जोह रहे सात गांवों के ग्रामीणों के सब्र का बांध आखिरकार टूट गया। सड़क नहीं तो आराम नहीं के नारों के साथ सैकड़ों ग्रामीणों ने जिला मुख्यालय पहुंचकर विशाल जनाक्रोश रैली निकाली।
शुक्रवार को रैली भराड़ी टैक्सी स्टैंड से पारंपरिक वाद्य यंत्राें के साथ शुरू होकर पूरे नगर और एसबीआई तिराहे से होते हुए कलक्ट्रेट परिसर पहुंची। नारों से पूरा नगर गूंज उठा। कलेक्ट्रेट परिसर में प्रदर्शन के बाद ग्रामीणों ने जिलाधिकारी के माध्यम से पीएम, केंद्रीय सड़क एवं परिवहन मंत्री और प्रदेश के सीएम को ज्ञापन भेजा। ज्ञापन में ग्रामीणों ने बताया कि फुलवाड़ी, फुलाचौंरा, थलीधार, खाईधार, सापुली, गुठण और ठांगधार, गाड़ाखरिक की जनता 2006 से लगातार सड़क के लिए संघर्ष कर रही है। सैन्य बाहुल्य क्षेत्र होने के बावजूद सेवानिवृत्ति के बाद भी बुजुर्गों को चार से पांच किलोमीटर की खड़ी और खतरनाक चट्टानी चढ़ाई पैदल नापनी पड़ रही है।
2006 से अब तक केवल मिले कोरे आश्वासन
ज्ञापन में ग्रामीणों ने बताया कि 2006 में तत्कालीन सांसद प्रदीप टम्टा, सीएम एनडी तिवारी, भगत सिंह कोश्यारी, 2009 में भुवन चंद्र खंडूड़ी, 2012 में विजय बहुगुणा, 2016 में हरीश रावत, 2017 में त्रिवेंद्र सिंह रावत, 2019 में विधायक बलवंत सिंह भौर्याल और 2021 और 2025 में सीएम पुष्कर सिंह धामी, क्षेत्रीय विधायक सुरेश गढि़या की ओर से लगातार आश्वासन दिए गए। पांच दिसंबर 2019 को तो बुलडोजर से केवल औपचारिकता के लिए थोड़ी देर खोदाई कर काम बंद कर दिया गया। ग्रामीणों ने आक्रोश जताते हुए कहा कि बार-बार छह महीने में काम शुरू होने का झांसा दिया गया लेकिन आज तक धरातल पर एक ईंट तक नहीं रखी गई। उन्होंने चेतावनी दी कि अब कागजी आश्वासनों से कोई समझौता मंजूर नहीं होगा। जब तक धरातल पर सड़क का निर्माण शुरू नहीं होता, आंदोलन जारी रहेगा। इस मौके पर समिति के संरक्षक चरण सिंह बघरी, अध्यक्ष पूर्व कैप्टन रतन सिंह दानू, उपाध्यक्ष शेर सिंह दानू, उपाध्यक्ष गजेंद्र सिंह धामी, कोषाध्यक्ष मदन सिंह धामी, सचिव करम सिंह दानू आदि रहे।
आंदोलन को मिला राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों का समर्थन
हमारा आधा जीवन इस पथरीली चढ़ाई पर पैदल नापते हुए बीत गया। हम नहीं चाहते कि जो दर्द हमने सहा, वह हमारी आने वाली पीढ़ी भी सहे। जब तक सड़क धरातल पर नहीं उतरती, यह बूढ़ी टांगें पीछे नहीं हटेंगी। -दलीप सिंह, बुजुर्ग, फोटो 21
गांव में सड़क न होने से सबसे ज्यादा तकलीफ हम महिलाओं को उठानी पड़ती है। बीमार पड़ने या प्रसव के वक्त मरीज को डोली में लादकर 5 किलोमीटर पैदल ले जाना पड़ता है। नाती-पोतों के उज्ज्वल भविष्य के लिए ही आज हम कलेक्ट्रेट पहुंचे हैं। -कमला देवी, बुजुर्ग महिला
सड़क न होने के कारण गांव से लगातार पलायन हो रहा है। शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाएं दम तोड़ रही हैं। हम अपने हक और गांव के अस्तित्व को बचाने के लिए इस लड़ाई को अंजाम तक पहुंचाकर ही दम लेंगे। -संजय सिंह, युवा