बागेश्वर। प्रतिभा किसी स्थान या परिवार विशेष की मोहताज नहीं होती। कुदरत जिस पर मेहरबान हो, वही इसका हकदार होता है। अपने भीतर की प्रतिभा को निखारने और तराशने वाला ही कलाकार बनता है। इस बात को साबित कर रहे हैं, जिला मुख्यालय के बागनाथ वार्ड निवासी राहुल कुमार। बेहद साधारण परिवार से ताल्लुक रखने वाले राहुल ने छोटी से उम्र में अपनी प्रतिभा को पहचाना और विषम हालातों के बावजूद अपने हुनर को तराशने में जुट गए। कड़ी मेहनत और लगन से उन्होंने अपने बचपन के शौक को साकार कर दिखाया।
चार बहनों के इकलौते भाई राहुल के पिता महेश ने मजदूरी कर अपनी बच्चों की परवरिश की। राहुल को बचपन से चित्रकारी करने का शौक था। परिवार की माली हालत को देखते हुए राहुल ने कक्षा 11 में पेंटिंग और ड्राइंग को रुपया कमाने का माध्यम बनाने की सोची। इंटर के बाद उन्होंने स्नातक में ड्रॉइंग विषय को चुना। बागेश्वर के डिग्री कॉलेज में ड्रॉइंग विषय नहीं होने के कारण उन्हें राजकीय महाविद्यालय कपकोट में दाखिला लेना पड़ा। धीरे-धीरे वह चित्र और स्कैच बनाने में परिपक्व होते गए तो उन्होंने पढ़ाई के साथ आर्ट और पेंटिंग की दुकानों में काम करना शुरू किया। राहुल ने सोचा कि दुकानों में काम करने उन्हें सीखने को मिलेगा और घर खर्च के लिए कुछ मदद भी हो जाएगी लेकिन उनका यह अनुभव काफी बुरा रहा। उन्हें उनके कार्य का उचित मेहनताना नहीं मिला, जिसके कारण उन्होंने दुकानों में काम करना छोड़ दिया और चित्रकला के साथ मूर्तिकला में हाथ आजमाने लगे।
राहुल बताते हैं कि चित्रकला को निखारने में कॉलेज से मदद मिली लेकिन मूर्ति निर्माण उन्होंने घर पर ही सीखा। पहले मिट्टी से मूर्तियां बनाई, धीरे-धीरे सीमेंट से मूर्तियों का निर्माण करना सीखा। वर्तमान में वह आसानी से पेंटिंग और मूर्ति निर्माण कर लेते हैं।
आर्थिक तंगी बन रही सफलता की राह में रोड़ा
बागेश्वर। राहुल के माता-पिता बुजुर्ग हो गए हैं। पहले पिता मजदूरी करते थे, जिससे घर खर्च चल जाता था। अब राहुल के सामने पढ़ाई के साथ परिवार का खर्चा चलाने की भी जिम्मेदारी है। राहुल का कहना है कि आर्थिक मंदी के कारण वह अपनी कला का भी सदुपयोग नहीं कर पा रहा है। शिक्षा पूरी करने के बाद वह चित्रकला और मूर्तिकला पर आधारित कारोबार करना चाहता है लेकिन इसके लिए धन जुटाना भी चुनौती है।
कोट
चित्रकला और मूर्तिकला मेरे बचपन शौक था लेकिन अब यही मेरी जिंदगी है। अभी हालात मेरे अनुकूल नहीं है लेकिन पूरी उम्मीद है कि एक दिन मेरा शौक ही मेरी पहचान बनेगा।
राहुल कुमार, बागेश्वर