बागेश्वर। कपकोट विधानसभा क्षेत्र के मयूं गांव के लोगों को ठगे जाने का अहसास है। उन्हें हर चुनाव में नेताओं के आश्वासन मिलते हैं लेकिन चुनाव होने के बाद ग्रामीणों को फिर से उन्हीं के हाल में छोड़ दिया जाता है। इस गांव की सबसे बड़ी समस्या है सड़क। गांव तक सड़क नहीं पहुंचने के कारण ग्रामीणों को दो किमी की दूरी पैदल तय करनी पड़ती है।
तब जाकर वे अपने रोजमर्रा के सामान खरीद पाते हैं। सड़क के अभाव में ग्रामीणों को गैस सिलिंडर के भी अधिक दाम चुकाने पड़ते हैं। और तो और वोट डालने के लिए भी ग्रामीणों को दो किमी जाना पड़ेगा तभी अपना विधायक चुन पाएंगे। इस गांव के पास सड़क का कटान कुछ महीने पहले शुरू हुआ था। अब काम बंद है। सड़क कब नसीब होगी यह भगवान ही जानें।
बागेश्वर से करीब 19 किमी की दूरी पर स्थित घिंघारूतोला से दो किमी की दूरी पर स्थित है मयूं गांव। मूलत: नाघर साहू ग्राम पंचायत के मयूं गांव में करीब 45 परिवार निवास करते हैं। गांव अब तक मोटर मार्ग से नहीं जुड़ सका है। हालांकि सड़क कटान का काम चल रहा है। गांव से करीब एक किमी की दूरी पर मोटर मार्ग है, लेकिन उसका निर्माण पूरा नहीं होने से अभी वाहनों की आवाजाही कम है। ग्रामीणों को नजदीकी बाजार घिंघारूतोला से रोजमर्रा का सामान लाना पड़ता है जिसके लिए रोजाना दो किमी की दौड़ लगानी पड़ती है।
रसोई गैस सिलिंडर के लिए ग्रामीणों को 200 रुपये की मजदूरी देनी पड़ती है। वहीं सिलिंडर को किसी दुकान में रखकर भरवाने के लिए 50 से 100 रुपये अलग से चुकाने होते हैं। इस कारण 937 रुपये का मिलने वाला रसोई गैस सिलिंडर उन्हें 1200 रुपये से अधिक कीमत में मिलता है। सड़क के अलावा जंगली जानवरों से भी ग्रामीण परेशान हैं। गांव में जंगली सुअर तकरीबन रोजाना फसलों को नुकसान कर जाते हैं। रही-सही कसर बंदर पूरी कर देते हैं। स्वास्थ्य सुविधा के लिए भी ग्रामीणों को घिंघारूतोला, कांडा या बागेश्वर जाना पड़ता है।
देवली में कभी 40 परिवार थे अब रह गए हैं सिर्फ आठ परिवार
बागेश्वर। मयूं के पास बसे देवली गांव का भी यही हाल है। किसी समय यहां 40 परिवार रहते थे, लेकिन सुविधाओं के अभाव में यहां सिर्फ आठ परिवार रह गए हैं। यहां के लोगों को सरकारें स्थानीय स्तर पर रोजगार तो नहीं दे सकीं लेकिन कुदरत की इस खूबसूरत कृति को खनन से खोखला करने का खेल सरकारों ने जरूर खेला है। गांव के खाली होने का मुख्य कारण रोजगार की तलाश में ग्रामीणों का पलायन है। हालांकि इस गांव की सबसे बड़ी खूबी है कि पलायन के बावजूद लोग अपनी माटी को भूले नहीं हैं। ग्रामीणों ने गांव छोड़कर विभिन्न क्षेत्रों में अपनी पहचान बनाई है।
आज भी गांव से बाहर रहने वाले लोग साल में एक बार गांव आकर अपनी पैतृक भूमि की खैर खबर लेना नहीं भूलते हैं। देवली गांव में प्रवेश करते ही पक्के घर दिखने लगते हैं। भले ही उन घरों में कोई रहता नहीं है। बावजूद इसके इन घरों के रंगरोगन और सफाई की व्यवस्था ग्रामीण करते हैं। मुख्य रूप से इड़ा ग्राम पंचायत के तोक देवली गांव के लोगों को भी रोजमर्रा का सामान जुटाने के लिए घिंघारूतोला आना पड़ता है। गांव की समस्या भी करीब मयूं गांव जैसी है। हालांकि इस गांव में एक नई समस्या भी उभर रही है। तमाम ग्रामीणों के विरोध के बाद भी शासन ने गांव में खड़िया खनन शुरू करा दिया। इससे भूस्खलन संवेदी इस गांव के अस्तित्व पर आने वाले दिनों में संकट मंडराना तय है।
मयूं गांव की प्रमुख समस्या सड़क की है। गांव तक मोटर मार्ग नहीं होने से रोजमर्रा का सामान लाने में परेशानी होती है। बुजुर्ग लोगों को अधिक दिक्कत का सामना करना पड़ता है। कई बार विधायक से मांग करने पर सड़क कटनी शुरू हुई है लेकिन यह कब तक बनेगी इसका पता नहीं है।
भूपाल सिंह मेहता, मयूं
गांव में जंगली जानवरों का आतंक बढ़ता जा रहा है। किसी समय में गांव के खेत अनाज से लहलहाते थे, अब जंगली सुअरों ने खेतीबाड़ी चौपट कर दी है। तेंदुआ और अन्य जानवरों का भी भय रहता है। नेता केवल वोट मांगते हैं। ग्रामीणों की परेशानी दूर नहीं करते।
नंदी देवी, मयूं
मयूं गांव के सड़क से नहीं जुड़ने से लोगों को रोजमर्रा का सामान लाना काफी महंगा पड़ जाता है। भारी सामान के लिए मजदूर लगाना पड़ता है। गांव में रोजगार के कोई साधन नहीं है। युवा महानगरों को पलायन कर रहे हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं की भी दरकार है।
दर्वान सिंह मेहता, मयूं
जंगली जानवरों का आतंक बढ़ गया है। सुअर और बंदर खेतों में उगी फसल, सब्जियों को बर्बाद कर देते हैं। कभी खेतों में होने वाला अनाज पूरे साल भर चलता था। अब लागत निकालना भी दूभर हो गया है। नेता वोट मांगते समय समस्या सुनकर आश्वासन दे जाते है, लेकिन समाधान नहीं खोजते।
रेखा मेहता, मयूं
देवली गांव से कई लोग शहरों की ओर पलायन कर गए हैं। सिमटती जनसंख्या के कारण गांव में किसी के बीमार होने पर परेशानी खड़ी हो जाती है। लोग नहीं होने से गांव के चारों ओर झाड़िया उग रही हैं जिसके कारण अक्सर जंगली जानवरों का खतरा बना रहता है।
तुलसी देवी, देवली
देवली के लोग साधन संपन्न होने के बावजूद अपने गांव से प्रेम करते हैं। पलायन करने के बावजूद हर ग्रामीण ने अपने घरों को सुव्यवस्थित किया है। हालांकि गांव में बंदर और सुअरों का आतंक बढ़ने से अब खेतीबाड़ी समाप्त होने लगी है। जंगली जानवरों की परेशानी दूर करने के इंतजाम खोजने चाहिए।
लीलाधर भट्ट, देवली