बागेश्वर। 22 साल के उत्तराखंड में आज भी कई गांव बुनियादी जरूरतों से महरूम हैं। इन्हीं गांवों में बागेश्वर जिले के खुनौली का नाम भी शुमार है। सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, पेयजल, सिंचाई, जंगली जानवरों के आतंक जैसी मूलभूत समस्याओं से जूझ रहे गांव से पलायन लगातार बढ़ रहा है। आलम यह है कि पिछले 10 वर्षों में गांव की 40 फीसदी आबादी ने गांव छोड़ दिया है। लगातार पलायन से गांव का हर तीसरा घर लगभग खाली हो गया है।
खुनौली गांव की दूरी जिला मुख्यालय से 30 किमी है। गांव तक जाने के लिए बागेश्वर-कांडा मोटर मार्ग के सातचौंरा से ढालन-खुनौली मोटर मार्ग का निर्माण किया गया है। हालांकि ग्रामीणों को अब भी आधा किमी की दूरी पैदल तय करनी पड़ती है। सड़क कुछ ऐसी है कि वाहन चालकों के साथ पैदल चलने वालों को भी परेशानी का सामना करना पड़ता है। गांव में स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव है। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के कार्यकाल में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी) की घोषणा हुई थी। अस्पताल के लिए भूमि का अधिग्रहण भी हुआ, लेकिन सात साल बीतने के बाद भी अस्पताल का काम शुरू नहीं हो सका है। गांव में कई पेयजल स्रोत होने के बावजूद पेयजल योजना का निर्माण नहीं होने से लोगों को परेशानी उठानी पड़ रही है। गांव की सिंचाई नहरें जर्जर हो चुकी हैं। नहरों की मरम्मत नहीं होने से खेतों तक पानी नहीं पहुंच पाता है।
जिसके कारण किसानों ने रोपाई करना छोड़ दिया है। सब्जी और फल उत्पादकों को जंगली सुअर और बंदरों के आतंक से जूझना पड़ रहा है। सिंचाई और जंगली जानवरों के आतंक से गांव की करीब 30 प्रतिशत उपजाऊ भूमि बंजर हो गई है। किसानों का खेतीबाड़ी से मोह भंग हो रहा है। गांव से पलायन भी बढ़ रहा है। 10 वर्ष पहले गांव में 100 से अधिक परिवार रहते थे। वर्तमान में 60-65 परिवार ही गांव में बचे हैं। साधन-संपन्न लोग अब भी पलायन कर रहे हैं। लगातार पलायन से गांव का हर तीसरा घर लगभग खाली हो गया है। कुछ घरों में केवल बुजुर्ग बचे हैं। युवा रोजगार की तलाश में महानगरों की ओर चले गए हैं। पलायन का असर गांव के प्राथमिक विद्यालय पर भी पड़ा है। एकल शिक्षक के भरोसे चल रहे प्राथमिक विद्यालय में करीब 17 बच्चे हैं। जिनमें अधिकांश छात्र नेपाली श्रमिकों के बच्चे हैं।
ग्राम प्रधान विहीन है खुनौली
बागेश्वर। खुनौली गांव में कोई प्रधान नहीं है। 2019 में हुए पंचायत चुनाव में ग्राम पंचायत के प्रधान की सीट को आरक्षित कर दिया गया था। गांव में दो आरक्षित परिवार थे। दो लोगों ने प्रधान पद के लिए नामांकन भी कराया था। लेकिन अलग-अलग कारणों से दोनों के नामांकन निरस्त हो गए थे। योग्य उम्मीदवार नहीं होने के कारण गांव मुखिया विहीन चल रहा है। प्रधान नहीं होने से ग्राम पंचायत की खुली बैठक नहीं हो सकी है। मनरेगा के तहत होने वाले कार्य भी प्रभावित हो रहे हैं। ग्राम प्रधान नहीं होने से गांव के विकास कार्य ठप हैं।
खुनौली गांव में सब्जियों का बहुतायत में उत्पादन होता था। जंगली जानवरों के आतंक से लागत निकालना भी मुश्किल होने लगा। लोगों ने खेतीबाड़ी बंद कर दी और रोजगार की तलाश में पलायन शुरू कर दिया। चुनाव के समय नेता बंदर और सुअर से निजात दिलाने की बात करते हैं लेकिन फिर भूल जाते हैं। जिसके कारण लोगों को जीविकोपार्जन के लिए गांव छोड़ने को मजबूर होना पड़ रहा है।
दयाधर कांडपाल, काश्तकार
गांव के लिए सड़क तो बनी, लेकिन आबादी तक नहीं पहुंची। स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं होने से बीमार और घायल होने पर लोगों को कांडा या बागेश्वर ले जाना पड़ता है। गांव से सड़क में ले जाने के लिए डोली की मदद लेनी पड़ती है। पीएचसी स्वीकृत होने के बावजूद गांव को सुविधा नहीं मिल पा रही है। नेता केवल दावे और वादे से लोगों को बरगलाने का काम करते हैं। जनता की परेशानी सुनने वाला कोई नहीं है।
महेश कांडपाल, पूर्व सैनिक
गांव में पेयजल और सिंचाई का उचित प्रबंध नहीं है। पुरानी पेयजल लाइन जर्जर है। क्षतिग्रस्त पाइप लाइन से पानी रिसकर बर्बाद हो रहा है। सिंचाई नहरें वर्षों से बदहाल पड़ी हैं। चुनाव के समय नेता और कार्यकर्ता वोट मांगते समय लुभावने वादे करके जाते हैं। जीतने के बाद जनप्रतिनिधियों की शक्ल दिखनी भी बंद हो जाती है। ग्रामीण अपने हाल पर गुजर-बसर करने को मजबूर हैं।
राजू कांडपाल, ग्रामीण
खुनौली गांव मूलभूत समस्याओं से जूझ रहा है। स्वास्थ्य व्यवस्था नहीं होने से लोग परेशान हैं। पैदल रास्तों की सुध लेने वाला कोई नहीं है। शिक्षा के बेहतर इंतजाम नहीं होने से लोग गांव छोड़ रहे हैं। जनप्रतिनिधियों की अनदेखी से हंसता-खेलता गांव वीरान होता जा रहा है। ग्रामीण केवल वोट बैंक बनकर रह गए हैं। मूलभूत सुविधाओं की आस कब पूरी होगी, कोई बताने वाला नहीं है।
नवीन कांडपाल, ग्रामीण
बदहाल हुआ बागेश्वर के खुनौली गांव को जोड़ने वाला मोटर मार्ग। संवाद न्यूज एजेंसी- फोटो : BAGESHWAR