अशिक्षित होने के बाद भी बचनदेई ने शिक्षा और संस्कृति जगत में अपने हुनर का लोहा मनवाकर उत्तराखंड का नाम रोशन किया है।
बचनदेई की जादुई आवाज का कमाल था कि दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में पूर्व प्रधानमंत्री स्व. जवाहर लाल नेहरू भी थिरकने को मजबूर हो गए थे।
जादुई आवाज का स्मरण
भले ही वह आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी जादुई आवाज हमेशा उनका स्मरण कराती रहेगी। भिलंगना प्रखंड के जीवानंद श्रीयाल ने अपनी स्वरचित कविताओं और लेखन से महाविद्यालय के पाठ्यक्रमों में जगह बनाई।
उनकी कविताएं आज भी युवा पीढ़ी के लिए मार्गदर्शक का काम कर रही हैं।
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मार्च 2004 में 79 वर्ष की आयु में उनका स्वर्गवास हो गया लेकिन उनकी रचनाएं आज भी जनमानस में रची-बसी हैं। ऐसी ही शख्सियत दोणी गांव की बचनदेई हैं जो अनपढ़ होते हुए भी 13 साल की उम्र से ही चैतवाली, पवाड़ा, जागर समेत कई गीत गाकर अपनी पहचान मना चुकी थी।
कभी निरक्षरता आड़े नहीं आई
उनके सामने कभी निरक्षरता आड़े नहीं आई। उनकी प्रतिभा को देखते हुए गढ़वाल विवि ने उन्हें 2006 में संगीत विषय में विजिटिंग प्रोफेसर नियुक्त किया था। बचनदेई की सुरीली आवाज की कई ऑडियो- वीडियो कैसेट में घर-घर में मौजूद है।
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