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जौंया मुरुली और बिणाई की सुरीली तान अब सुनाई नहीं देती

Sat, 17 Dec 2016 11:49 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला ब्यूरो, अल्मोड़ा।
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पारंपरिक वाद्ययंत्र - फोटो : अमर उजाला
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अल्मोड़ा। लोक संस्कृति अपने विविध रूपों में प्राकृतिक रूप से खिले फूलों की तरह जीवन के हर मोड़ पर अपनी सार्थकता सिद्ध करती आई है। इस संस्कृति को जोड़ने में सुरीली तान छेड़ने वाले पहाड़ के लोक वाद्य यंत्र भी शामिल हैं, लेकिन लोक वाद्य यंत्र अलगोजा (जौंया मुरूली), बिणाई, भौंकर, नागफनी, इकतारा अब विलुप्ति की कगार पर हैं जबकि कुछ वाद्य यंत्र दमाऊ, रणसिंह,  नगाड़ा या तो प्रचलन से बाहर हो रहे हैं या फिर रोजी-रोटी नहीं मिल पाने से और पाश्चात्य संस्कृति की चकाचौंध में कलाकारों ने इन वाद्य यंत्रों को बजाना छोड़ दिया है। 
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  प्रसिद्ध लेखक गोविंद चातक ने लिखा है कि संगीत या तो कंठ पर निर्भर करता है या वाद्य पर और वाद्य के बिना संगीत और नृत्य दोनों अपूर्ण कहे जा सकते हैं। यहां यह बताना भी जरूरी है कि लोक वाद्य वह है, जिसे वादक कलाकार पुस्तैनी रूप से बजाते हैं, जो कि पर्वतीय क्षेत्रों में शादी, नामकरण, स्थानीय देवताओं की पूजा, जागर, जात्रा, बैसी आदि में प्रयोग में लाए जाते रहे हैं। इनमें कुछ लोक वाद्य यंत्र जंगलों, नदियों के किनारे और वियोग में एकांत में भी बजाए जाते थे। इनमें जौंयां मुरुली यानि अलगोजा, बिंणाई, भौंकर, इकतारा आदि शामिल हैं जो अब पहाड़ से विलुप्त हो रहे हैं। 

अलगोजा यानी जौंया मुरूली हिंदी शब्द जुड़वा का कुमाऊंनी रूप है। इस लोक वाद्य में दो सामान्य मुरुलियां एक साथ जुड़ी होती हैं। वर्तमान में यह लोक वाद्य लगभग विलुप्त हो गया है। वादन के समय इसमें एक स्वर लगातार बजता रहता है और दूसरी ओर लोकधुन भी साथ-साथ बजती जाती है। रिंगाल के तने से बनने वाली जौंया मुरूली को लोग पहाड़ों में मार्ग लंबा होने पर चलते समय बजाया करते थे।
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राजूला मालूसाही लोकगाथा के बीच में इसे बजाया जाता था। नदी,  तालाबों में एकांत में बैठकर भी लोग इसे बजाया करते थे। अब अलगोजा बजाने वाले मात्र कुछ ही कलाकार रह गए हैं। अल्मोड़ा के कुंवर सिंह रावल, लाल सिंह आदि कलाकारों को इस लोक वाद्य को बजाने में महारथ हासिल थी। अब यहां के एकमात्र कलाकार रीठागाड़ के हर सिंह गैड़ा इसे बजाते हैं। इस वाद्ययंत्र की खास बात है कि इसमें रंगीली धुन, बैरागी धुन, उदासी धुन और जंगली चार प्रकार की धुनें ही बजाई जाती हैं। 

बिणाई ग्रामीण महिलाओं द्वारा बजाया जाने वाला लोक वाद्य है, जिसका उपयोग महिलाओं के अलावा पुरुष, युवक, युवतियां भी विशेष रूप से किया करते थे। विरह वेदना की धुन देने वाली बिणाई विरह की पीड़ा को बहलाने का साधन रहा करता था। लोहे से बना छोटा सा वाद्य जिसे महिलाएं उसके दोनों सिरों को अपने दांतों के बीच दबाकर बजाती हैं।

इसके दोनों सिरों के बीच लोहे की एक पतली  और लचीली पत्ती लगी होती है, जिसे उंगली से हिलाने पर कंपन पैदा होता है। श्वास लेने और छोड़ने पर इसकी टंकार में विविधता आती है। इस वाद्य को स्थानीय लोहार बजाया करते थे, लेकिन समय के साथ-साथ लोहार गिरि का धंधा करने वालों ने इसे बनाना छोड़ दिया है और महिलाएं भी इसे भूलती जा रही हैं। 

प्रसिद्ध लोकगायक और संगीताचार्य मोहन सिंह रीठागाड़ी के कलाकार पुत्र सीएस बोरा रीठागाड़ी का कहना है कि अब लोक वाद्य यंत्रों को कलाकारों ने बजाना छोड़ दिया है, क्योंकि इससे उनको रोजी-रोटी नहीं मिल पा रही है। रंगकर्मी जुगल किशोर पेटशाली का कहना है कि पाश्चात्य संगीत इतना हावी हो गया है कि कलाकारों ने स्वयं भी लोकधुनों को बजाना छोड़ दिया है। पाश्चात्य संस्कृति के हावी होने से लोक कला और लोक संगीत पर ग्रहण लगने लगा है। उन्होंने कहा कि संस्कृति प्रेमियों और सरकारों ने इस बारे कुछ नहीं किया तो आने वाली पीढ़ी इनका नाम भी नहीं जान पाएगी। 
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