प्रो. जगत सिंह बिष्ट
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अल्मोड़ा। सोबन सिंह जीना विश्वविद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. जगत सिंह बिष्ट कई सालों से हिंदी भाषा में साहित्य सृजन कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि हिंदी भारत की आत्मा है। हिंदी में रोजगार की अपार संभावनाएं हैं। डिजिटल होती जा रही दुनिया में विज्ञान संकाय के छात्रों का रुझान भी हिंदी के प्रति बढ़ रहा है। दुनियाभर के देशों में हिंदी का प्रसार बढ़ रहा है। लोग भारत को समझने के लिए भी हिंदी सीखना चाहते हैं।
पिथौरागढ़ जिले के पथरौली (अस्कोट) में जन्में प्रो. जगत सिंह बिष्ट को बचपन से ही हिंदी से काफी लगाव था। उन्होंने हाईस्कूल से लेकर एमए (हिंदी) तक की सभी परीक्षाएं प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कीं। वर्ष 1985 में राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय से शिक्षण कार्य शुरू किया। वर्ष 1991 से सोबन सिंह जीना विवि के हिंदी विभाग में पढ़ा रहे हैं। वह हिंदी विभागाध्यक्ष, शोध एवं प्रसार निदेशालय के निदेशक हैं।
प्रो. जगत का पहला काव्य संग्रह वर्ष 1998 में ‘सन्नाटे का वक्तव्य’ नाम से प्रकाशित हुआ। इसके बाद उनकी कई पुस्तकें प्रकाशित हुईं। प्रो. जगह सिंह रामगढ़ स्थित कुमाऊं विश्वविद्यालय के महादेवी वर्मा सृजन पीठ के निदेशक भी रह चुके हैं। उन्होंने कहा कि ऐसा कोई क्षेत्र नहीं है, जहां हिंदी की जरूरत न पड़ती हो। हिंदी सिर्फ एक विषय नहीं है बल्कि यह भारत की आत्मा है। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिंदी अपनी चमक बिखेर रही है। भारत धीरे-धीरे आर्थिक शक्ति बन रहा है। ऐसे में विदेशियों को भी हिंदी सीखने की जरूरत महसूस होने लगी है।
प्रो. बिष्ट के निर्देशन में 21 विद्यार्थी कर चुके हैं पीएचडी
अल्मोड़ा। प्रो. जगत सिंह बिष्ट के निर्देशन में 21 छात्र-छात्राओं ने पीएचडी की उपाधि प्राप्त की और कई विद्यार्थी शोधरत हैं। पीएचडी करने के बाद ये सभी माध्यमिक और उच्च शिक्षा में शिक्षक के तौर काम कर रहे हैं। प्रो. बिष्ट के 50 से अधिक शोधपत्र विविध राष्ट्रीय पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। कविताएं, कहानियां प्रकाशित हुईं हैं। आकाशवाणी से वार्ताएं, कविताएं, कहानियां प्रसारित हुईं हैं।