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दुर्लभ मूर्तियों, ताम्रपत्रों का गढ़ रही है प्राचीन द्वारिका नगरी द्वाराहाट

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तकुल्टी के देवाब मंदर्र में मिली दुर्लभ लकुलीश की मूर्ति। संवाद - फोटो : RANIKHET
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द्वाराहाट (अल्मोड़ा)। पौराणिक द्वारिका नगरी के नाम से विख्यात द्वाराहाट दुर्लभ मूर्तियों और ताम्रपत्रों का गढ़ रहा है। पाली पछाऊं के नाम से विख्यात इस क्षेत्र में कई कत्यूर कालीन मंदिर हैं। तहसील के तकुल्टी गांव स्थित तकुल्टी के देबाव नामक स्थान पर भगवान शिव के अवतार माने जाने वाले लकुलीश की दुर्लभ मूर्ति मिलने से वहां कौतूहल है। शोधकर्ताओं का दावा है कि तकुल्टी में लकुलीश संप्रदाय का सबसे बड़ा पंचायतन मंदिर स्थापित है। बता दें कि यहां पूर्व में कई ताम्रपत्र, प्रागैतिहासिक सयंत्र यानी ओखलियां भी मिल चुकी हैं।
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जालली-सुरेग्वेल के ऐतिहासिक मंदिरों की शोध योजना के तहत जोयूं से दो किमी दूर तकुल्टी गांव स्थित देबाव नामक स्थान पर प्राचीन कत्यूरी शैली मंदिर मिला है। कत्यूरकालीन 13वीं-14वीं शताब्दी का यह उपेक्षित भव्य पंचायतन मंदिर गुमनामी की हालत में आज भी अस्तित्व को बचाए हुए है। शोधकर्ता दिल्ली विवि रामजस कॉलेज के पूर्व एसोसिएट प्राध्यापक डॉ. मोहन चंद्र तिवारी ने बताया कि कुमाऊं के जाने माने इतिहासकारों ने इस दुर्लभ ऐतिहासिक मंदिर का संज्ञान नहीं लिया और न ही यहां विराजमान देवता और उसकी मूर्तिकला का राष्ट्रीय धरातल पर ही मूल्यांकन हो सका।
उत्तराखंड में पंचायतन मंदिरों का अस्तित्व लगभग खत्म हो चुका है। इन प्राचीन मंदिरों के संरक्षण की आवश्यकता है। तकुल्टी के देबाव का वह सर्वेक्षण और निरीक्षण कर चुके हैं लेकिन मंदिर के मुख्य देवता के पहचान की दिक्कत रही है। उन्होंने बताया कि इस बार सर्वेक्षण में जोयूं और तकुल्टी के स्थानीय लोगों की मदद से पहले इस मंदिर की साफ-सफाई की गई। यहां मूर्ति मिली और सेवानिवृत्त शिक्षक दयाकृष्ण तिवारी ने मूर्ति का शुद्धीकरण किया।
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चंद राजाओं ने भी नहीं किया मंदिर का संरक्षण
द्वाराहाट। डॉ. मोहन चंद्र तिवारी ने बताया कि कत्यूरी राजाओं ने लकुलीश शिव की भक्ति के लिए दुनागिरि विभांडेश्वर क्षेत्र में लकुलीश का भव्य पंचायतन मंदिर बनवाया। यहां मन्या मंदिर के साथ-साथ नीचे एक नौले का भी निर्माण करवाया। इस मंदिर की स्थापत्य शैली द्वाराहाट के मृत्युंजय मंदिर से मिलती है। अर्धमंडप युक्त मंदिर का शिखर और आमलक कत्यूरी काल की नागर शैली का प्रतिनिधित्व करते हैं। कालांतर में यह देवता लोकप्रिय नहीं रहने के कारण यह मंदिर भी मुख्य धारा में उपेक्षित होता गया। चंद राजाओं ने भी इस मंदिर के संरक्षण में कोई रुचि नहीं ली।
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